कबूतरों के संपर्क में आने से हो सकती हैं ये गंभीर बीमारी, दिल्ली के गंगा राम अस्पताल में सामने आया एक चौंका देने वाला मामला

दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल से एक चौंका देने वाला मामला सामने आया है। यहां 11 साल के लड़के को लंबे समय तक कबूतर के संपर्क में रहने से निमोनया हो गया था।

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Written By: priya mishra | Published : July 18, 2024 12:50 PM IST

आजकल पशु-पक्षियों से फैलने वाली बीमारियों के मामले काफी बढ़ रहे हैं। कुछ दिनों पहले पश्चिम बंगाल में एक चार साल के बच्चे में बर्ड फ्लू का मामला सामना आया है। वहीं हाल ही में दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में एक चौंका देने वाला मामला देखने को मिला है। यहां एक 11 साल का लड़के को लंबे समय तक कबूतर के संपर्क में रहने से निमोनया हो गया। शरीर में कई गंभीर लक्षण दिखने के बाद उसे इमरजेंसी में अस्पताल में भर्ती कराया गया था। आइए, जानते हैं क्या पूरा मामला -

कबूतर के संपर्क में रहने से हुई ये बीमारी

सर गंगा राम अस्पताल के पीडियाट्रिक इंटेंसिव केयर यूनिट (पीआईसीयू) के सह-निदेशक डॉ. धीरेंद्र गुप्ता ने बताया कि लड़के में हाइपर सेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस (एचपी) का संक्रमण पाया गया है, जो कबूतरों की बीट की एलर्जी के कारण हुआ है। यह एक प्रकार का इम्यून सिस्टम डिसऑर्डर है, जिसमें फेफड़ों में सूजन आने के साथ ही एलर्जिक रिएक्शन भी हो जाता है। रिपोर्ट्स की मानें तो बच्चे के रेस्पिरेटरी फंक्शन्स ठीक तरह से काम नहीं कर रहे थे। इसके अलावा, उसे खांसी भी आ रही थी। डॉ. धीरेंद्र गुप्ता ने बताया कि बच्चे के फेफड़ों में सूजन और धुंधलापन देखा गया है।

कैसे फैलता है रोग?

अक्सर कबूतर हमारे घर, छत और बालकनी में बैठते हैं और उस जगह पर पॉटी कर देते हैं। इंसान जब कबूतर की बीट के संपर्क में आता है, तो उसे एलर्जिक रिएक्शन हो सकता है। इसके अलावा, कबूतर में पंखों में एक फंगस पाया जाता है, जो इंसानों में हाइपरसेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस का कारण बन सकता है। कई मामलों में यह संक्रमण दिमाग में सूजन यानि मेनिनजाइटिस का भी कारण बन सकता है।

फेफड़ों पर पड़ सकता है बुरा असर

कबूतरों के मल और पंख के संपर्क में आने से आपके फेफड़ों पर काफी बुरा असर पड़ सकता है। यदि आप कबूतर के मल के करीब जाते हैं या उसके संपर्क में आते हैं, तो यह संक्रमण नाक के रास्ते होता हुआ आपके फेफड़ों तक पहुंच सकता है। इस स्थिति में रेस्पिरेटरी फंक्शन्स पर प्रभाव पड़ता है, जिससे व्यक्ति को सांस लेने में कठिनाई भी हो सकती है।