सूअर की चमड़ी ट्रांसप्लांट करने से 19 अंधे लोगों की आंखों की रोशनी लौटी! जानें कैसे हुआ चमत्कार

आंख की ये परेशानी कोर्निया से जुड़ा रोग है, जिसकी वजह से आंखों की रोशनी चली जाती है। हर एक लाख लोगों की आबादी में 50 से 200 लोग इस बीमारी का शिकार होते हैं।

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Written By: Jitendra Gupta | Published : August 18, 2022 1:17 PM IST

सांइस को चमत्कार की दुनिया माना जाता है और हर दिन कोई न कोई चमत्कार होता रहता है। एक ऐसा ही चमत्कार अब सामने आया है। नेचर बायोटेक्नोलॉजी में 11 अगस्त को प्रकाशित एक अध्ययन में ये सामने आया है कि सूअर की चमड़ी से बनी आंख को लगाने से अंधे व गंभीर रूप से देखने में परेशानी से पीड़ित लोगों की रोशनी वापस आ गई।

50 से 200 लोग होते हैं इसका शिकार

स्वीडन की लिंकोपिंग यूनिवर्सिटी और तेहरान यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिकल साइंसेंज के शोधकर्ताओं की एक टीम केरेटोकोनस (keratoconus) का उपचार तलाश रही है। आंख की ये परेशानी कोर्निया से जुड़ा रोग है, जिसकी वजह से आंखों की रोशनी चली जाती है। बात करें इससे प्रभावित होने वाले लोगों की तो हर एक लाख लोगों की आबादी में 50 से 200 लोग इस बीमारी का शिकार होते हैं।

हालांकि इस बीमारी के लिए उपचार के कई विकल्प मौजूद हैं लेकिन ये तरीके सभी मरीजों के लिए काम नहीं करते हैं और कुछ को देखने के लिए पूरे के पूरे कोर्निया ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ती है।

कैसे किया सूअर की चमड़ी का इस्तेमाल

अपने शोध में शोधकर्ताओं की टीम ने सुअर की चमड़ी का इस्तेमाल कर एक चीज तैयार की, जो कोर्निया को मोटा बनाने में मदद करती है और उसकी सुरक्षा कर आंखों के काम करने की क्षमता को बहाल करती है। इस चीज को टेस्ट करने के लिए शोधकर्ताओं ने 20 मरीजों को इसमें शामिल किया। इन मरीजों का कोर्निया क्षतिग्रस्त था। कोर्निया आंख के बाहर मौजूद एक सुरक्षा कवच की तरह काम करता है। ये मरीज भारत और ईरान के थे, जिनमें से 14 पूर्ण रूप से अंधे थे।

3 लोग पूरी तरह देखने में सक्षम

अध्ययन के मुताबिक, परिणाम अद्भुत थे। रिपोर्ट के मुताबिक, ये आई इंप्लांट बहुत ज्यादा प्रभावी रहा क्योंकि तीन मरीज सर्जरी के बाद पूर्ण रूप से देखने में सक्षम थे। वहीं 20 में से 19 मरीजों के देखने की क्षमता में मामूली से लेकर कुछ न कुछ सुधार पाया गया था।

किसी प्रकार की कोई दिक्कत नहीं

डॉक्टरों ने करीब दो साल तक मरीजों की देखभाल की और किसी भी मरीज को टिश्यू सहित कोई भी दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ा। उन्होंने हालांकि ये भी कहा कि कुछ मरीजों की देखने की क्षमता दूसरों की तुलना में काफी बेहतर पाई गई।

पहला कारनामा नहीं

बता दें कि यह पहली बार नहीं हुआ है कि सूअरों ने मनुष्यों को अपने अंगों के माध्यम से एक नया जीवन देने का काम किया है। पहले भी वैज्ञानिकों ने सूअर के जीन-से कई चीजें बनाई हैं। दशकों से मेडिकल के क्षेत्र में सूअरों के हृदय के वाल्वों को मनुष्यों में सफलतापूर्वक ट्रांसप्लांट किया जाता रहा है।

दिल और किडनी का हो चुका है इस्तेमाल

इस साल की शुरुआत में भी यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड स्कूल ऑफ मेडिसिन के डॉक्टरों ने आनुवंशिक रूप से मोडिफाइड सूअर के दिल को 57 वर्षीय रोगी में ट्रांसप्लांट किया था। उससे बहुत पहले, NYU के शोधकर्ताओं ने एकसुअर की सूअर के जीन से बनी किडनी को मानव शरीर से जोड़ा था और ये दुनिया का पहला सफल जीवन रक्षक जेनोट्रांसप्लांटेशन था।

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