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गुर्दे (किडनी) रोगियों को भूलकर भी नहीं करना चाहिए इस 1 चीज का सेवन, 3 गुना बढ़ जाएगा किडनी फेल्योर का खतरा
हेल्थ एक्सपर्ट, डॉक्टर और यहां तक की हमारे बड़े-बुजुर्ग सभी ये कहते हैं कि हमारी डाइट हमारी सेहत को सुधारने में एक बहुत भूमिका निभाती है। मौजूदा वक्त में ज्यादातर डायटिशियन लोगों से वेगन डाइट यानी शाकाहार अपनाने की सलाह देते हैं क्योंकि इसके पीछे एक बड़ी वजह है। वजह है ये है कि पिछले कुछ अध्ययनों से ये संकेत मिलता है कि रेड मीट कार्डियोवस्कुलर डिजीज के साथ-साथ कैंसर के खतरे को भी बढ़ा सकता है। यही नहीं मांस का बहुत अधिक सेवन कई और नुकसान का वैज्ञानिक इशारा करता है।
अमेरिकन सोसायटी ऑफ नेफ्रोलॉजी (JASN) के जर्नल में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन में इस बात की ओर इशारा किया गया है कि वे लोग, जो किडनी से संबंधित रोगों से पीड़ित हैं उन्हें रोजाना की अपनी डाइट में मांस का सेवन करना बहुत भारी पड़ सकता है और ये उनके संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है। शोधकर्ताओं ने यह कहते हुए अपने अध्ययन का निष्कर्ष निकाला है कि जो लोग पहले से ही क्रॉनिक किडनी रोग से पीड़ित हैं, उन्हें मीट के सेवन से बचना चाहिए और अपनी किडनी की सुरक्षा के लिए मांस के बजाए अपनी डाइट में फलों और सब्जियों का सेवन बढ़ाना चाहिए।
शोध के मुताबिक, किडनी को ठीक से काम करने के लिए हेल्दी डाइट की बहुत आवश्यकता होती है। क्रॉनिक किडनी रोग (सीकेडी) के रोगियों के लिए हुए इन अध्ययनों से पता चला है कि आपकी डाइट किडनी फेल्योर के विकास के जोखिम को काफी हद तक प्रभावित कर सकती है।
सैन फ्रांसिस्को स्थित कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय की प्रोफेसर तनुश्री बनर्जी और उनके सहयोगियों ने इस बात का पता लगाने की कोशिश की है कि क्या एसिड से भरी डाइट किडनी फेल्योर में अहम भूमिका निभा सकती है।
अध्ययन के मुताबिक, कम एसिड लोड वाले आहार फलों और सब्जियों से भरपूर होते हैं, जबकि उच्च एसिड वाले आहार में अधिक मीट होता है।
तनुश्री बनर्जी ने निष्कर्षों पर कहा, "फलों और सब्जियों से भरपूर डाइट, जो कि अधिक स्वस्थ होती है ऐसी डाइट को फॉलो कर जीवन पर आने वाले खर्च और जिंदगी को खराब तरीके से जीने जैसी स्थितियों से बचा जा सकता है।"
शोधकर्ताओं ने 1,486 वयस्कों पर मिली जानकारी का विश्लेषण किया, जो क्रॉनिक किडनी रोगों से पीड़ित थे। ये रोगी नेशनल हेल्थ एंड न्यूट्रिशिन एग्जामिनेशन सर्वेक्षण III (NHANES III) में शामिल हुए थे। ये सर्वे सामुदायिक आवास वयस्कों का एक बड़ा राष्ट्रीय सैंपल है। इस अध्ययन के लिए 14.2 वर्ष की अवधि तक रोगियों की स्वास्थ्य स्थितियों को फॉलो किया गया।