स्किन पर मामूली सा ये टेस्ट पता लगा सकता है आप पार्किंसंस के शिकार हैं या नहीं, जानें कितना सटीक है ये तरीका

मौजूदा वक्त में पार्किंसंस रोग का पता लगाने का कोई सटीक तरीका नहीं है लेकिन अब वैज्ञानिकों ने ऐसा तरीका खोज निकाला है, जिसके जरिए मामूली सा स्किन टेस्ट कर आप पार्किंसंस रोग का पता लगा सकते हैं। 

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Written By: Jitendra Gupta | Updated : October 24, 2020 4:02 PM IST

वर्तमान में पार्किंसंस रोग के शुरुआती निदान के लिए ऐसा कोई आसान और विश्वसनीय तरीका उपलब्ध नहीं है, जिससे ये पता लगाया जा सके कि किस व्यक्ति को ये रोग है। इस रोग का पता लगाने के लिए डॉक्टरों लक्षणों, पारिवारिक इतिहास और अन्य कारकों को सावधानीपूर्वक देखते हैं। लेकिन आयोवा स्टेट यूनिवर्सिटी (Iowa State University) द्वारा किए गए एक नए अध्ययन से ये पता चला है कि अब सिर्फ एक साधारण से स्किन टेस्ट से आप पार्किंसंस रोग की पहचान कर सकते हैं। जी हां, वैज्ञानिकों ने इस रोग के निदान का एक तरीका खोज निकाला है, जिसके माध्यम से स्किन का सैंपल लेकर उसमें अल्फा-सिन्यूक्लिन क्लंपिंग (alpha-synuclein clumping) नाम के प्रोटीन का पता लगाया जा सकता है।

वैज्ञानिक कई साल से मानव और जानवरों के विकारों में मिसोल्डेड प्रोटीन का पता लगाने के लिए शोध कर रहे हैं।

बता दें कि यह अध्ययन एरिजोना स्टडी ऑफ एजिंग एंड न्यूरोडीजेनेरेटिव डिसऑर्डर (AZSAND) / बैनर सन हेल्थ रिसर्च इंस्टीट्यूट के ब्रेन एंड बॉडी डोनेशन प्रोग्राम द्वारा दिए गए 50 स्किन सैंपल पर किया गया था। इसमें से आधे नमूने पार्किंसंस रोग के रोगियों से प्राप्त किए गए थे।

वैज्ञानिकों ने पार्किंसंस रोग के 25 में से 24 रोगियों का सही ढंग से निदान करने के लिए प्रोटीन टेस्ट का उपयोग किया जबकि केवल 1 रोगी में प्रोटीन क्लंपिंग पाई गई थी।

एरिजोना स्थिति मेयो क्लिनिक में न्यूरोलॉजी के प्रोफेसर और अध्ययन के सह-लेखक डॉ. चार्ल्स एडलर ने बताया कि ये परिणाम अत्यधिक संवेदनशीलता और विशिष्टता का संकेत देते हैं, जो क्लिनिकल ट्रायल के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।"

अध्ययन के सह लेखक और बैनर सन हेल्थ रिसर्च इंस्टीट्यूट की सिविन लेबोरेटरी के प्रमुख एमडी, डॉ. थॉमस बीच ने कहा, “पार्किंसंस रोग का प्रारंभिक-चरण में पता लगाने की सटीकता काफी खराब रही है, ये केवल 50-70 फीसदी के आसपास ही जाती है। इसलिए आगे मस्तिष्क को किसी प्रकार की क्षति न पहुंचे इसके लिए प्रारंभिक चरण में ही क्लिनिकल ट्रायल करने की आवश्यकता होती है। ये प्रक्रिया इसलिए भी बाधित होती है क्योंकि उनमें बहुत सारे लोग ऐसे शामिल होते हैं जिन्हें ये रोग नहीं हो सकता है। पार्किंसंस रोग के लिए नए उपयोगी उपचारों को खोजने के लिए हमें सबसे पहले क्लिनिकल डायग्नोस सटीकता में सुधार पर काम करना होगा। ”

पार्किंसंस रोग अल्फा-सिन्यूक्लिन प्रोटीन में गड़बड़ी के कारण होता है, जो मस्तिष्क में न्यूरोनल क्षति की वजह से जमा हो जाते हैं। अल्फा-सिन्यूक्लिन प्रोटीन स्किन के साथ-साथ शरीर के अन्य टिश्यू में भी एकत्रित हो जाते हैं।

उन्होंने कहा, “स्किन सैंपल के परीक्षणों से पार्किंसंस रोग का पहले पता चल सकता है। अगर डॉक्टर को पहले से रोगी में पार्किंसंस रोग के लक्षणों का पता चल जाएगा तो वह पार्किंसंस के लक्षणों में विस्तार को रोकने और लक्षणों की गति को धीमा करने के लिए चिकित्सीय रणनीतियों का परीक्षण करने की अनुमति दे सकता है। ”