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बच्चे के व्यक्तित्व की रूपरेखा तैयार करती है परवरिश : डॉ. साहनी

परवरिश एक ऐसी कुंजी है, जो एक बच्चे के व्यक्तित्व की रूपरेखा तैयार करती है। बच्चा किस प्रकार दुनिया को देखेगा, उसका नजरियाए धारणा और गुण, निस्संदेह उसके माता-पिता से प्रभावित और विकसित होते हैं।

बच्चे के व्यक्तित्व की रूपरेखा तैयार करती है परवरिश : डॉ. साहनी
बच्चे के व्यक्तित्व की रूपरेखा तैयार करती है परवरिश : डॉ. साहनी। © Shutterstock.

Written by IANS |Updated : January 13, 2020 1:07 PM IST

''सकारात्मक परवरिश'' सेमिनार (Positive Upbringing Seminar) के संदर्भ में विख्यात व्यवहार वैज्ञानिक और जिंदल स्कूल ऑफ बिहेवियरल साइंसेज (जीआईबीएस) के प्रधान निदेशक प्रोफेसर डॉक्टर संजीव पी. साहनी ने कहा कि ऐसा कहा जाता है कि बच्चे अपने माता-पिता की छवि होते हैं और परवरिश (parental Upbringing) एक ऐसी कुंजी है, जो एक बच्चे के व्यक्तित्व की रूपरेखा तैयार करती है। बच्चा किस प्रकार दुनिया को देखेगा, उसका नजरियाए धारणा और गुण, निस्संदेह उसके माता-पिता से प्रभावित और विकसित होते हैं। यहां आयोजित एक वार्ता में बच्चों को एक बेहतर और सफल मनुष्य बनाने के लिए कुछ मापदंडों और अवधारणाओं पर प्राथमिक बल देने के साथ सकारात्मक परवरिश की आवश्यकता पर चर्चा की जा रही है।

जिंदल इंस्टीट्यूट ऑफ बिहेवियरल साइंसेज (जेआईबीएस) की स्थापना 22 अप्रैल 2014 को हुई थी। यह ओ. पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी का शोध संस्थान है।

साहनी ने अपने संबोधन में कहा, "दुनिया बदल रही है और ऐसा ही हर समाज के साथ हो रहा है। भारतीय समाज इससे कोई अलग नहीं है। आज की वीयूसीए (अस्थिर, अनिश्चित, जटिल और फुर्तीली) दुनिया में बहुत उथल-पुथल है, जहां प्रतिदिन तेजी से परिवर्तन हो रहे हैं। परवरिश (parental Upbringing) करना बहुत कठिन हो गया है। माता-पिता अपने बच्चों के साथ जिस तरह से व्यवहार करते हैं, वो यह निर्धारित करने में एक महत्वपूर्ण कारक है कि बच्चे समस्या को हल करने, निर्णय लेने, लक्ष्य का अनुसरण करने, तनाव को संभालने, अपनी भावनाओं को समझने और नियंत्रित करने, सफलता और असफलताओं से निपटने में क्या तरीका अपनाएंगे।"

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वार्ता में सकारात्मक शब्दों का प्रयोग करने पर बल दिया गया, जिससे बच्चों को अपनी ताकत पहचानने और ऊर्जा सही दिशा में उपयोग करने में मदद मिल सके।

डॉ. साहनी ने माता-पिता के व्यवहार स्वरूपों और बच्चों पर इसके परिणामी प्रभावों पर बल दिया। उन्होंने कहा कि ये व्यवहार सुसंगत और असंगत दोनों हो सकते हैं। बच्चों पर माता-पिता के असंगत व्यवहार का एक प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और परिणामस्वरूप उनके व्यवहार में परिवर्तन आता है। बातचीत करने में बाधाएं हो सकती हैं, जो बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती हैं।

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उन्होंने कहा कि घर पर बच्चे कभी-कभी माता-पिता के साथ झगड़े में उलझ जाते हैं, जो कि अपरिहार्य है। बचपन में कुछ मनमुटाव और झगड़े बच्चों को असहमति को सुलझाने के कुछ सकारात्मक तरीके ढूंढने में मदद करते हैं।

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