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Written By: Yogita Yadav | Published : February 21, 2019 5:17 PM IST
वैज्ञानिक भी इस बात से सहमत हैं कि मातृभाषा यानी अपनी भाषा में अपने विचारों को अभिव्यक्त करना ज्यादा आसान होता है। © Shutterstock
आज 21 फ़रवरी है। इस दिन को पूरी दुनिया में अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में मनाया जाता है। वैश्विक स्तर पर साक्षरता के क्षेत्र में होने वाले शोध में बार-बार यह बात रेखांकित हुई है कि मातृभाषा में होने वाली पढ़ाई बच्चों के लिए काफ़ी फ़ायदेमंद है। सिर्फ इतना ही नहीं मातृभाषा के साथ एक अन्य भाषा बोलने वाले बच्चे ज्यादा अक्लमंद होते हैं।
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इसलिए हुई शुरूआत
यूनेस्को द्वारा भाषायी विविधता को बढ़ावा देने और उनके संरक्षण के लिए अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस की शुरूआत की गई। हम अक्सर देखते हैं कि बहुत सी बातें अवधी, भोजपुरी, ब्रजभाषा, मगही, मराठी, कोंकणी, बागड़ी और गरासिया आदि भाषाओं (अथवा बोलियों) में कही जाती हैं उनका व्यापक असर होता है।
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ये हैं अपनी भाषा के फायदे
अमूमन जिस भाषा को आप जन्म लेते ही अपने आसपास सुनते हैं, वही आपकी मातृभाषा होती है। वैज्ञानिक भी इस बात से सहमत हैं कि मातृभाषा यानी अपनी भाषा में अपने विचारों को अभिव्यक्त करना ज्यादा आसान होता है।
मातृभाषा का व्याकरण, उसे बोलने का लहजा तथा शब्द भंडार कहीं से सीखने की जरूरत नहीं पड़ती, इसे आप उम्र बढ़ने के साथ धीरे-धीरे खुद ही सीख जाते हैं। जबकि दूसरी भाषा को सीखने के लिए आपको प्रशिक्षक और किताबों की जरूरत पड़ती है।
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जिस भाषा में आप सहज है उसमें बात करने पर आप ज्यादा कॉन्फीडेंट होते हैं। यह आत्मविश्वास आपके हर काम में झलकता है। जिससे चारों ओर सराहना भी मिलती है।
मातृभाषा से बच्चों का परिचय घर और परिवेश से ही शुरू हो जाता है। इस भाषा में बातचीत करने और चीज़ों को समझने-समझाने की क्षमता के साथ बच्चे विद्यालय में दाख़िल होते हैं। अगर उनकी इस क्षमता का इस्तेमाल पढ़ाई के माध्यम के रूप में मातृभाषा का चुनाव करके किया जाये तो इसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिलते हैं।
ब्रिटेन के यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग के शोधकर्ताओं ने शोध में यह पाया कि वैसे बच्चे जो स्कूल में अलग भाषा बोलते हैं और परिवारवालों के साथ घर में अलग भाषा का इस्तेमाल करते हैं, उन्हें बुद्धिमत्ता जांच में उन बच्चों के मुकाबले अच्छे अंक आए जो सिर्फ गैर-मातृभाषा जानते हैं। इस अध्ययन में ब्रिटेन में रहनेवाले तुर्की के सात से 11 साल के 100 बच्चों को शामिल किया गया। इस आईक्यू जांच में दो भाषा बोलने वाले बच्चों का मुकाबला ऐसे बच्चों के साथ किया गया जो सिर्फ अंग्रेजी बोलते हैं।