
साधना तिवारी
साधना तिवारी 15 वर्षों से मीडिया क्षेत्र में हैं। लगभग 9 वर्षों से अधिक समय से ZEE ग्रुप के साथ जुड़ी हुई ... Read More
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भारत ही नही बल्कि दुनिया भर के लिए कम उम्र में लिवर की बीमारियोँ का बढता प्रसार हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स के लिए बडी चिंता का विषय बन चुका है।यही वजह है कि अब डायबीटीज और कार्डियोवस्कुलर बीमारियोँ के बाद लिवर की बीमरियोँ को लाइफ स्टाइल सम्बंधी सबसे बडे खतरे के रूप में देखा जा रहा है।
हाल में हुई बच्चोँ से सम्बंधित एक अध्ययन में बेहद चौंकाने वाले परिणाम सामने आए हैं जिसने सबका ध्यान आकर्षित किया हैऔर लिवर सम्बंधी बीमारियोँ के बढते खतरे के सम्बंध में चर्चा करने के लिए मजबूर किया है।
कोलम्बिया यूनिवर्सिटी द्वारा कराए गए अध्ययन में पाया गया कि 35% मोटे बच्चोँ में 8 साल की उम्र से ही नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज (एनएएफएलडी) के लक्षण नजर आने लग गए थे।
यह अध्ययन करीब 635 बच्चोँ पर किया गया था जिसमेँ पाया गया कि 3 साल की उम्र में जिन बच्चोँ की कमर की चौडाई अधिक होती है उन्हेँ अगले 5 वर्षोँ में एनएएफएलडी के लक्षण सामने आने का खतरा दोगुना रहता है।
एनएएफएलडी पर प्रकाश डालते हुए कोलम्बिया एशिया हॉस्पिटल, पटियाला के कंसल्टेंट गैस्ट्रोइंटेरोलॉजिस्ट डॉ. जी. एस. सिद्धू ने कहा कि, “एनएएफएलडी वास्तव में उन लोगोँ के लिवर के अंदर फैट का जमाव होता है जो या तो अल्कोहल नहीँ लेते हैं अथवा बेहद कम मात्रा में लेते हैं। लिवर शरीर का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण अंग होता है जो शरीर के सभी टॉक्सिंस को बाहर निकालने का काम करता है। लिवर में 5 से 10 पर्सेंट फैट होना सामान्य बात है, लेकिन जब इससे अधिक फैट जमा हो जाता तब लिवर को फैटी माना जाता है। फैटी लिवर बडी समस्या का कारण नहीँ बन सकता है, लेकिन यह स्थिति धीरे-धीरे लिवर के गम्भीर इंफ्लेमेशन, स्कारिंग, सिरोसिस और यहाँ तक कि लिवर फेलियर में बदल सकती है। इससे पहले कि एनएएफएलडी एडवांस स्टेज में बढकर गम्भीर रूप ले ले, स्वस्थ्य और संतुलित आहार, जिसमेँ शुगर और फैट के मात्रा कम हो, लेकर समस्या को ठीक किया जा सकता है। चूंकि एनएएफएलडी में कोई स्पष्ट लक्षण सामने नहीं आता है, ऐसे में व्यक्ति को नियमित जांच कराते रहना चाहिए, खासतौर से तब जब व्यक्ति पहले कभी किसी तरह की समस्या से प्रभावित हो चुका हो।"
ऐसी स्थिति में जब मोटापा भारत के अधिकतर हिस्से, खासतौर से शहरी इलाकोँ के लोगोँ को अपनी चपेट में ले चुका है, तब एनएएफएलडी के सम्बंध में हालिया अध्ययन के परिणाम एक अलार्म की तरह हैं, खासतौर से देश भर की हेल्थकेयर इंडस्ट्री के लिए।
देश में 15 से 49 साल आयुवर्ग में 31% से अधिक शहरी महिलाएँ और 26% शहरी पुरुष या तो सामान्य से अधिक वजन वाले हैं अथवा मोटापे की चपेट में हैं। पंजाब में 32% महिलाएँ और 43% पुरुष मोटापे की चपेट में हैं। पटियाल की शहरी आबादी के आंकडे पूरे राज्य की आबादी के लिए एक आईना हैं, जहाँ 32% महिलाएँ और 43% पुरुष मोटे हैं।
डॉ. जी. एस. सिद्धू ने कहा कि, “राज्य में 32% मोए लोगोँ की संख्या तब कम नही रह जाती है जब हम प्रभावित लोगोँ की आबादी का आंकलन करते हैं। हालांकि देश में वयस्क लोगोँ के मोटापे से सम्बंधित काफी आंकडे उपलब्ध हैं, मगर बच्चोँ के मामले में पर्याप्त डाटा का अभाव है। एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में यह पाया गया है कि वर्ष 2025 तक, भारत में मोटे बच्चोँ की संख्या 17 मिलियन से ऊपर पहुंच जाएगी, जिसके बाद सबसे अधिक मोटे बच्चोँ वाले भारत बच्चोँ के मोटापे के मामले में 184 देशोँ में दूसरे पायदान पर आ जाएगा।
एक बार यह बीमारी एड्वांस स्टेज पर पहुंच जाती है तब इसका कोई इलाज नहीं बचता है। ऐसे में अधिकतर मामलोँ में प्राथमिक रूप से जीवनशैली में बदलाव पर फोकस किया जाता है, खासतौर से डाइट में बदलाव पर। एनएएफएलडी का सम्बंध कार्डियोवस्कुलर बीमारियोँ, क्रॉनिक किडनी डिजीजऔर अन्य स्थितियोँ से भी हो सकता है, ऐसे में हर किसी के लिए यह बेहद जरीरी हो जाता है कि वह अपने लिवर की सही देखभाल करे।
स्रोत: Press Release.