
किशोरी मिश्रा
किशोरी मिश्रा को डिजिटल मीडिया का लगभग 8+ वर्षों का व्यापक अनुभव है, जिसमें स्वास्थ्य (Health) और जीवनशैली ... Read More
Written By: Kishori Mishra | Published : May 6, 2026 9:45 AM IST
Kidney transplant
Study on Kidney Transplant: जिन मरीजों की किडनी पूरी तरह से खराब हो गई है, उन मरीजों के लिए किडनी ट्रांसप्लांट एक बड़ी उम्मीद होती है, जिससे उन्हें नया जीवनदान मिलता है। लेकिन ट्रांसप्लांट के बाद भी मरीजों को कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जिसमें सबसे बड़ी चुनौती शरीर का नए अंग को स्वीकार करना है। अक्सर मरीजों को जीवनभर ऐसी दवाइयां लेनी पड़ती हैं, जो इम्यून सिस्टम को दबाकर रखती हैं, ताकि शरीर नई किडनी पर हमला न करे। हालांकि, इन दवाओं के लंबे समय तक इस्तेमाल से इन्फेक्शन, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और किडनी को नुकसान जैसे कई साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं। ऐसे मरीजों के लिए एक नई स्टडी ने इस दिशा में उम्मीद जगाई है।
अमेरिका में हुई एक फेज-2a क्लिनिकल ट्रायल में वैज्ञानिकों ने दो बायोलॉजिक दवाओं डाजोडालिबेप और बेलाटासेप्ट का इस्तेमाल किया। ये दोनों दवाएं इम्यून सिस्टम के उन रास्तों को ब्लॉक करती हैं, जो ट्रांसप्लांटेड किडनी को रिजेक्ट करने के लिए जिम्मेदार होते हैं। अच्छी बात यह है कि इस थेरेपी में रोजाना ओरल इम्यूनोसप्रेसिव दवाओं की जरूरत नहीं पड़ी।
इस रिसर्च में 23 ऐसे मरीजों को शामिल किया गया, जिन्होंने पहली बार किडनी ट्रांसप्लांट कराया था। ट्रांसप्लांट के बाद मरीजों को तय अंतराल पर इन दोनों दवाओं की IV डोज दी गई और करीब 48 सप्ताह तक उनकी निगरानी की गई। शुरुआती कुछ मरीजों में रिजेक्शन के संकेत दिखे, जिसके बाद डोजिंग प्रोटोकॉल में बदलाव किया गया। इसके बाद मिले नतीजे उत्साहजनक रहे।
अब तक ट्रांसप्लांट मरीजों को रोजाना कई गोलियां लेनी पड़ती थीं। दवाएं मिस होने पर रिजेक्शन का खतरा बढ़ जाता था। लेकिन यह नई ड्यूअल इम्यून चेकपॉइंट ब्लॉकेज थेरेपी समय-समय पर दी जाने वाली दवा पर आधारित है, जिससे मरीजों पर रोजाना दवा लेने का दबाव कम हो सकता है और साइड इफेक्ट्स भी घट सकते हैं।
हालांकि, यह शुरुआती ट्रायल था और इसमें मरीजों की संख्या सीमित थी, इसलिए डॉक्टरों का मानना है कि बड़े स्तर पर और रिसर्च जरूरी है। अगर आने वाले ट्रायल्स में भी ऐसे ही नतीजे मिलते हैं, तो भविष्य में किडनी ट्रांसप्लांट के बाद इलाज का तरीका पूरी तरह बदल सकता है।
नई इम्यूनोथेरेपी किडनी ट्रांसप्लांट मरीजों के लिए गेमचेंजर साबित हो सकती है। यह न सिर्फ रिजेक्शन के खतरे को कम कर सकती है, बल्कि मरीजों को रोजाना भारी दवा के बोझ से भी राहत दिला सकती है। आने वाले वर्षों में यह तकनीक ट्रांसप्लांट मेडिसिन में बड़ा बदलाव ला सकती है।
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