किडनी ट्रांसप्लांट मरीजों के लिए बड़ी उम्मीद, स्टडी में बताया नई थेरेपी से रिजेक्शन का खतरा हो सकता है कम

New immunotherapy for kidney transplant: हाल ही में एक नई स्टडी सामने आई है, जो किडनी ट्रांसप्लांट के मरीजों के लिए एक राहत की खबर हो सकती है। आइए जानते हैं इस बारे में-

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Written By: Kishori Mishra | Published : May 6, 2026 9:45 AM IST

Study on Kidney Transplant: जिन मरीजों की किडनी पूरी तरह से खराब हो गई है, उन मरीजों के लिए किडनी ट्रांसप्लांट एक बड़ी उम्मीद होती है, जिससे उन्हें नया जीवनदान मिलता है। लेकिन ट्रांसप्लांट के बाद भी मरीजों को कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जिसमें सबसे बड़ी चुनौती शरीर का नए अंग को स्वीकार करना है। अक्सर मरीजों को जीवनभर ऐसी दवाइयां लेनी पड़ती हैं, जो इम्यून सिस्टम को दबाकर रखती हैं, ताकि शरीर नई किडनी पर हमला न करे। हालांकि, इन दवाओं के लंबे समय तक इस्तेमाल से इन्फेक्शन, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और किडनी को नुकसान जैसे कई साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं। ऐसे मरीजों के लिए एक नई स्टडी ने इस दिशा में उम्मीद जगाई है।

क्या कहती है नई रिसर्च?

अमेरिका में हुई एक फेज-2a क्लिनिकल ट्रायल में वैज्ञानिकों ने दो बायोलॉजिक दवाओं डाजोडालिबेप और बेलाटासेप्ट का इस्तेमाल किया। ये दोनों दवाएं इम्यून सिस्टम के उन रास्तों को ब्लॉक करती हैं, जो ट्रांसप्लांटेड किडनी को रिजेक्ट करने के लिए जिम्मेदार होते हैं। अच्छी बात यह है कि इस थेरेपी में रोजाना ओरल इम्यूनोसप्रेसिव दवाओं की जरूरत नहीं पड़ी।

स्टडी में क्या हुआ?

इस रिसर्च में 23 ऐसे मरीजों को शामिल किया गया, जिन्होंने पहली बार किडनी ट्रांसप्लांट कराया था। ट्रांसप्लांट के बाद मरीजों को तय अंतराल पर इन दोनों दवाओं की IV डोज दी गई और करीब 48 सप्ताह तक उनकी निगरानी की गई। शुरुआती कुछ मरीजों में रिजेक्शन के संकेत दिखे, जिसके बाद डोजिंग प्रोटोकॉल में बदलाव किया गया। इसके बाद मिले नतीजे उत्साहजनक रहे।

रिजल्ट्स ने बढ़ाई उम्मीद

  • स्टडी में पाया गया कि किसी भी मरीज में एंटीबॉडी-मीडिएटेड रिजेक्शन नहीं देखा गया। 48 सप्ताह बाद भी मरीजों की किडनी अच्छी तरह काम कर रही थी।
  • मरीजों और ट्रांसप्लांटेड किडनी, दोनों की सर्वाइवल रेट 100% रही। कोई गंभीर थ्रॉम्बोटिक यानि ब्लड क्लॉट इवेंट सामने नहीं आया।
  • ये नतीजे बताते हैं कि यह नई रणनीति ट्रांसप्लांट के बाद लंबे समय तक किडनी को सुरक्षित रखने में मददगार हो सकती है।

क्यों है यह थेरेपी खास?

अब तक ट्रांसप्लांट मरीजों को रोजाना कई गोलियां लेनी पड़ती थीं। दवाएं मिस होने पर रिजेक्शन का खतरा बढ़ जाता था। लेकिन यह नई ड्यूअल इम्यून चेकपॉइंट ब्लॉकेज थेरेपी समय-समय पर दी जाने वाली दवा पर आधारित है, जिससे मरीजों पर रोजाना दवा लेने का दबाव कम हो सकता है और साइड इफेक्ट्स भी घट सकते हैं।

अभी और रिसर्च की जरूरत

हालांकि, यह शुरुआती ट्रायल था और इसमें मरीजों की संख्या सीमित थी, इसलिए डॉक्टरों का मानना है कि बड़े स्तर पर और रिसर्च जरूरी है। अगर आने वाले ट्रायल्स में भी ऐसे ही नतीजे मिलते हैं, तो भविष्य में किडनी ट्रांसप्लांट के बाद इलाज का तरीका पूरी तरह बदल सकता है।

नई इम्यूनोथेरेपी किडनी ट्रांसप्लांट मरीजों के लिए गेमचेंजर साबित हो सकती है। यह न सिर्फ रिजेक्शन के खतरे को कम कर सकती है, बल्कि मरीजों को रोजाना भारी दवा के बोझ से भी राहत दिला सकती है। आने वाले वर्षों में यह तकनीक ट्रांसप्लांट मेडिसिन में बड़ा बदलाव ला सकती है।

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