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दुनियाभर में ऐसी कई चुनिंदा बीमारियां हैं, जो लोगों को अपनी गिरफ्त में ले लेती हैं और तब तक नहीं छोड़ती जब तक उस रोगी की मौत नहीं हो जाती। यही हाल कुछ एड्स से होने वाली मौतों का है, जिसमें 2004 की तुलना में जरूर कमी देखी गई है लेकिन आंकड़ें अभी भी चौंकाने वाले हैं। आंकड़ों की मानें तो 2004 में करीब 19 लाख लोगों की मौत एड्स से हुई थी जबकि 2020 में ये आंकड़ा कम होकर 6,90, 000 तक पहुंच गया, जो भी ज्यादा है।
आंकड़ों के मुताबिक, एड्स से पीड़ित 2,14, 000 लोगों की मौत टीबी से हुई, जिसमें से सिर्फ 50 फीसदी लोगों में ही इस रोग की पुष्टि हुई थी बाकी के लोगों को ये पता भी नहीं था कि उन्हें टीबी है। बता दें कि बहुत से लोगों की मौत टीबी, एड्स औक आमतौर पर होने वाली मौतों की तुलना में फंगल इंफेक्शन के कारण हुई।
एक्सपर्ट का मानना है कि जितने एचआईवी इंफेक्शनसे पीड़ित ज्यादा से ज्यादा लोगों का इलाज हो रहेगा, मौतों की संख्या में कमी आती दिखाई देगी। लेकिन संख्या में कमी धीरे-धीरे ही होगी और इसके पीछे वजह फंगल बीमारी से होने वाली मौतों में कमी का चलन है।
फंगल बीमारियों से होने वाली मौत एचआईवी के उपचार की सलाह दिए जाने और उस पर काम करने से पहले ही हो जाती है। इसलिए सही तरीका ये है कि एचआईवी से ग्रस्त लोगों की पहले ही पहचान कर ली जाए और बीमार पड़ने से पहले ही वायरस का उपचार किया जाए ताकि इम्यूनिटी कमजोर न पड़े।
दुर्भाग्य की बात ये है कि बहुत से देशों में ये सिर्फ और सिर्फ एक तमन्ना है और एचआईवी का पता हमेशा हर जगह बाद में ही चलता है। बता दें कि 30 से 60 फीसदी एचआईवी के मामलों में रोगी पहले से ही एड्स का शिकार हो चुका होता है और उसके इम्यून सिस्टम को बहुत नुकसान पहुंचता है।
मौजूदा वक्त में अलग-अलग देशों में एचआईवी ड्रग्स रेजिस्टेन्स की दर 5 से 30 फीसदी रहती है। जब तक डॉक्टर इसका पता लगा पाते हैं और एचआईवी के लिए स्विच थेरेपी का यूज करते हैं तब तक लोगों की इम्यूनिटी कमजोर होनाशुरू हो जाती है। इस कारण से उन लोगों में गंभीर रूप से इंफेक्शन फिर चाहे वो फंगल बीमारी ही क्यों न हो उसका खतरा बढ़ जाता है। इंजेक्शन के रूप में दी जाने वाली एंटी-एचआईवी ड्रग्स और नई एंटी-वायरल गोलियों में रेजिस्टेंस की संभावना कम होती है और ये बीमार पड़ने की संभावना को भी हल करती है।
फंगल मेन्निंगटिस
फंगल निमोनिया
फंगस टीबी
कुल मिलाकर कहा जाए तो ये तीन सबसे आम संभावित घातक फंगल संक्रमण हैं, जो एचआईवी रोगियों में टीबी के मामलों से कहीं अधिक पाए जाते हैं, खासकर जब कुछ "टीबी के मामले" में टीबी नहीं होता है।