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Written By: Yogita Yadav | Published : January 7, 2019 12:33 PM IST
ये वायरस अधिकतर नवम्बर से मार्च के महीने में एक्टिवेट होता है। इस बीमारी की चपेट में सबसे पहले बंदर आए थे। ©Shutterstock
इन दिनों कर्नाटक में मंकी फीवर का कहर जारी है। इससे अब तक पांच लोगों की मौत की खबर है। जबकि कई अन्यों के ब्लड सैंपल जांच में पॉजीटिव पाए गए हैं। दुखद ये है कि जिन लोगों को मंकी फीवर से बचाव के वैक्सीन दिए गए हैं, उनमें भी इसके लक्षण फिर से सामने आ रहे हैं। इसके लिए प्रशासन ने तो कमर कस ही ली है, पर जरूरी है कि आप भी मंकी फीवर के बारे में सब कुछ जान लें। ताकि खुद को और अपने परिवार को बचाने के एहतियातन उपाय कर सकें।
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मंकी फीवर को क्यासनुर फॉरेस्ट डिजिज (केएफडी) भी कहा जाता है जो धीरे-धीरे फैलता है। 2016 में पहली बार पुष्टि के बाद से भारत में अब तक 327 लोग इसकी चपेट में आ चुके हैं। वर्ष 2018 में भी इस बीमारी ने कहर बरपाया था। तब 19 लोगों की मौत की खबर आई थी। हालांकि आंकड़ा इससे ज्यादा भी हो सकता है। इसे क्यासनुर फॉरेस्ट डिजिज (केएफडी) भी कहा जाता है जो धीरे-धीरे फैलता है।
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कहां से आया मंकी फीवर ?
मंकी फीवर सबसे पहले यास्नुर फॉरेस्ट से पहचान में आया। इसलिए इसे यास्नुर फॉरेस्ट डिजीज़ भी कहते है। ये पहली बार 1957 में लोगों के सामने आया था। अब तक सेंट्रल यूरोप, ईस्टर्न यूरोप और नॉर्थ एशिया में इसका प्रकोप देखा गया है। भारत में ज्यादातर गोवा, कर्नाटक और केरल इसके सर्वाधिक संवेदनशील इलाके माने गए हैं। जबकि पिछले वर्ष महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग जिले में भी इसके मामले सामने आए। नीलगिरि और बांदीपुर नेशनल पार्क में भी कुछ केस देखे गए हैं।
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नवंबर से मार्च है संवदेनशील समय
ये वायरस अधिकतर नवम्बर से मार्च के महीने में एक्टिवेट होता है। इस बीमारी की चपेट में सबसे पहले बंदर आए थे। अचानक से कर्नाटक के यास्नुर जंगल में बंदरों की संख्या कम होने लगी। तो खोजबीन शुरू हुई। पता चला कि ये एक तरह का वायरस है जो केवल बंदरों को ही नुकसान पहुंचा रहा है। जैसे ही कोई बंदर इसके संपर्क में आता है उसकी तबियत ख़राब होने लगती है और एक समय के बाद उसकी मौत हो जाती है। ये वायरस फ्लाविवायरस के समुदाय का था। नाम था टिक। इससे होने वाली बीमारी को टिक बॉर्न एन्सेफलाइटिस (टीबीई) कहते हैं। डॉक्टरों को उसी वक़्त अंदाजा हो गया था कि इंसान भी इसके चपेट में आने वाले है।
मंकी फीवर के लक्षण
मंकी फीवर के पीड़ित अक्सर तेज़ बुखार या फिर ब्लीडिंग होने की शिकायत करते हैं। इसके चलते शरीर में कंपकंपी, मानसिक अशांति का अहसास होता है। यही नहीं अनदेखी पर मौत भी हो सकती है। बीमारी पांचवें दिन के बाद घातक रूप लेना शुरू करती है। जब कंपकंपी छूटने जैसे दूसरे लक्षण दिखने शुरू होते हैं।
कैसे फैलता है मंकी फीवर?
मंकी फीवर लोगों से एक दूसरे में नहीं फैलता है। बल्कि, संक्रमित जानवरों का पंजा लगने या उसके संपर्क में आने से होता है, खासकर बंदरों से। दक्षिण भारत के तीन क्षेत्रों को इस बीमारी के लिए बेहद संवेदनशील माना गया है। मंकी फीवर से पीड़ित ज्यादातर मरीज एक या दो हफ्ते में ठीक हो जाते हैं।
मंकी फीवर का इलाज़
अभी तक यह लाइलाज बीमारी है। डॉक्टर्स इलाज खोजने में लगे हैं। इससे बचाव के लिए वैक्सीिन दिए जा रहे हैं। हम ज़्यादा से ज़्यादा सतर्कता बरत सकते हैं। वैक्सिनेशन और टिक इन्फेक्टेड जानवरों से बचना ही सबसे बेहतर उपाय है। ये कुछ हफ़्तों में भी ठीक हो सकता है और कई महीने भी लग सकते हैं। माना जा रहा है निकट भविष्यी में इसके मामले और बढ़ सकते हैं।
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