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भागदौड़ भरी जिंदगी और मॉडर्न लाइफ स्टाइल हमारे बच्चों के स्वास्थ्य पर भी तेजी से नकारात्मक प्रभाव छोड़ रही है। इसके गंभीर परिणाम उनकी युवावस्था में सामने आते हैं। इसका नतीजा कई बार आत्महत्या या गंभीर मानसिक बीमारी के रूप में सामने आता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में मानसिक बीमारी से जूझ रहे 50 फीसद लोग किशोरावस्था में ही इस समस्या से ग्रसित हो चुके थे।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट के अनुसार मानसिक बीमारियों से पीड़ित 50 फीसद लोगों में यह बीमारी किशोरावस्था में ही शुरू हो जाती है। फिर भी लोग इसे नजरअंदाज करते हैं। युवावस्था में इसके गंभीर परिणाम सामने आते हैं। इस रिपोर्ट में इस बात का भी खुलासा किया गया है कि हर चार में से एक व्यक्ति मनोरोग से पीड़ित है। 50 फीसद लोगों में 14 साल की उम्र में बीमारी की शुरुआत हो जाती है। बच्चों पर पढ़ाई का अत्यधिक दबाव भी मानसिक परेशानी का कारण बनता है।
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ये हो सकता है कारण
डॉक्टरों ने बताया कि कई लोग दूसरे बच्चों से अपने बच्चों की तुलना करते हैं। इससे भी बच्चों पर मानसिक दबाव बढ़ता है। इन दिनों मोबाइल व सोशल नेटवर्क पर बच्चे अधिक समय तक व्यस्त रहते हैं। इसका उनके मानसिक स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव देखा जा रहा है। कई लोग अपने बच्चों को लेकर इलाज के लिए पहुंचते हैं। यह देखा गया है कि मोबाइल व सोशल नेटवर्क पर अधिक समय देने से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है। इसलिए दो-तीन घंटे से अधिक समय तक मोबाइल व सोशल नेटवर्क साइट्स पर सक्रिय रहना मानसिक बीमारी का कारण बन सकता है।
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ये भी है बीमारी
अधिक सेल्फी लेना भी बीमारी है। इसे सेल्फाइटिस नाम दिया है। इंटरनेट, ऑनलाइन खेल, सोशल नेटवर्क पर घंटों सक्रिय रहना या किसी अन्य लत के कारण व्यवहार में अचानक परिवर्तन आने को मानसिक बीमारियों की इस श्रेणी में रखा गया है। इंटरनेट के बढ़ते दुष्प्रभाव के मद्देनजर इस तरह के क्लीनिक की जरूरत बढ़ती जा रही है।
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ऐसे करें बचाव