
साधना तिवारी
साधना तिवारी 15 वर्षों से मीडिया क्षेत्र में हैं। लगभग 9 वर्षों से अधिक समय से ZEE ग्रुप के साथ जुड़ी हुई ... Read More
Written By: Sadhna Tiwari | Updated : April 5, 2022 6:35 PM IST
Marijuana Consumption In Pregnancy: एक नयी स्टडी में दावा किया गया है कि अगर कोई गर्भवती महिला मारिजुआना या टीएचसी और सीबीडी केमिकल वाले किसी प्रकार की नशीली दवाओं का सेवन करती है, तो इससे गर्भस्थ शिशु में चाइल्डहुड ओबेसिटी और डायबिटीज का खतरा बढ़ सकता है। इस स्टडी को जर्नल ऑफ क्लिनिकल एंडोक्राइनोलॉजी एंड मेटाबॉलिज्म में प्रकाशित किया गया और इस स्टडी रिपोर्ट के मुताबिक, कई प्रेगनेंट महिलाएं कैनबिडियोल (सीबीडी) केमिकल युक्त दवाइयां ऑनलाइन या दवा दुकानों से खरीदती हैं।
स्टडी के अनुसार, ये महिलायें एंग्जाइटी, डिप्रेशन , अनिद्रा, दर्द और मतली जैसी प्रेगनेंसी के दौरान होने वाली रोज़मर्रा की समस्याओं से आराम पाने के एक सुरक्षित विकल्प के तौर पर इन दवाओं का सेवन करती हैं।स्टडी में ऐसा कहा गया है कि अधिकतर सीबीडी उत्पादों में कमर्शियल भांग से मिलायी जाती है और इनमें टेट्राहाइड्रोकोनाबिनोल (टीएचसी) की बहुत कम मात्रा होती है। (Marijuana Consumption In Pregnancy In Hindi)
समाचार एजेंसी आईएएनएस की रिपोर्ट के अनुसार, स्टडी की लेखक और कोलोराडो के ऑरोरा स्थित कोलोराडो स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ की असिस्टेंट प्रोफेसर ब्रायना मूर ने सीएनएन को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि यह एक गलत धारणा है कि गांजा, भांग या मारिजुआना का सेवन सुरक्षित है।उन्होंने कहा कि इसी गलत धारणा के चलते कई महिलाएं प्रेगनेंसी के दौरान इन नशीली दवाओं को अन्य पेन किलर दवाओं विकल्प के रूप में ले लेती हैं और कई बार वे डॉक्टर द्वारा लिखी गयी दवाओं के विकल्प के तौर पर भी इसे सुरक्षित मानते हुए इसका सेवन कर लेती हैं। लेकिन इन दवाओं का सेवन उनके होने वाले बच्चों में डायबिटीज और मोटापे का खतरा कई गुना तक बढ़ा सकता है।
इस शोध के लिये राष्ट्रीय अभियान हेल्थी स्टार्ट के तहत कोलोराडो में पंजीकृत 103 गर्भवती महिलाओं के यूरिन की जांच की गयी। जांच से पता चला कि 15 प्रतिशत महिलाओं के यूरिन में टीएचसी, सीबीडी सहित कई प्रकार के कैनबिनॉएड्स पाये गये। टीएचसी ऐसा रसायन है, जो डोपामाइन रिलीज करता है, जिससे नशा महसूस होता है।शोध से पता चला है कि,
ऐसा ही शोध सेंटर फोर डिजीज कंट्रोल ने भी किया था, जिससे पता चला कि इससे गर्भस्थ शिशु में असामान्य न्यूरोलॉजिकल डेवलपमेंट हो सकता है। इसके साथ ही उसके ऑटिज्म के शिकार होने, हाइपर एक्टिव होने, अटेंशन सीकर होने की संभावना बढ़ जाती है। बच्चे में अन्य व्यवहार संबंधी परेशानियां भी आ सकती हैं।
(आईएएनएस)