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कोविड़ 19 एक जानलेवा व बिना सोचे समझे आप के पास आने वाली बीमारी है। जो यदि आप को एक बार हो जाए तो आप के शरीर को विभिन्न तरीकों से प्रभावित करती है। सबसे पहले वैज्ञानिकों ने यह बताया था कि इस का असर केवल आप के श्वसन तंत्र पर पड़ता है। परन्तु बाद की कुछ रिसर्च में यह सामने आया है कि इस का असर आप की किडनी, लीवर व दिमाग जैसे मुख्य अंगों पर भी पड़ता है।
संक्रमित व्यक्ति की स्किन व स्किन के रोम छिद्र भी इस बीमारी के कारण बहुत प्रभावित होते हैं। यह किडनी जैसे मुख्य अंग को पूरी तरह डैमेज भी कर सकता है। जिस व्यक्ति में इस के लक्षण नहीं दिख रहे हैं, वह प्रभावित नहीं होता है।
रिसर्च ने यह साबित किया है कि जो लोग इस वायरस से संक्रमित होते हैं वह लगभग 3 महीनों में ही पूरी तरह से ठीक हो सकते हैं। इस बात पर एक अध्ययन भी किया गया जिसमें 124 लोगों को जो इस भयानक वायरस से संक्रमित थे उनका परिक्षण किया गया।
मरीजों को 3 प्रकार की कैटेगरी में बांटा गया पहले वह जो बहुत गंभीर थे और जो आईसीयू मे एडमिट थे। दूसरी कैटेगरी मे उन लोगों को शामिल किया गया जो थोड़ा कम गंभीर थे और जिन्हे अस्पताल के नर्सिंग वार्ड में ही एडमिट किया गया था। और तीसरे समूह में उन मरीजों को शामिल किया गया जिन्हे बहुत ही कम लक्षण दिख रहे थे।
इस अध्ययन में यह पाया गया कि जो लोग सबसे पहली कैटेगरी मे शामिल किए गए थे और उन को ठीक हुए 3 महीने भी हो गए थे। ऐसे मरीजों मे पाया गया कि उनके फेफड़ों की दशा सबसे ज्यादा खराब थी।
इस के बाद डॉक्टर्स ने उन लोगों का सीटी स्कैन व फेफड़ों की जांच की और पाया कि उसमें उन लोगो के फेफड़ों की दशा धीरे धीरे सुधर रही थी। इन लोगों के फेफड़ों के टिश्यू धीरे धीरे रिकवर हो रहे थे।
जो लोग वायरस से ठीक हो जाते हैं उनके ठीक होने के बाद सभी में मुख्यत: यही समस्या पाई गई की उन्हें बहुत जल्दी थकावट हो जाती है, छाती में दर्द होने लगता है और सांस कम आने लगती हैं।
इस प्रकार उनकी रोजाना की जिंदगी में बहुत सारी मुसीबतें आने लगती हैं। इसी प्रकार की समानताएं न्यूमोनिया के रोगियों में भी दिखाई देते हैं। अतः वायरस से रिकवर होने के बाद भी मरीजों को एक सामान्य जिंदगी में वापिस आने में बहुत अधिक समय लग जाता है।
बाकी कैटेगरी के मरीज जैसे जिन्हे लक्षण ज्यादा नहीं दिखाई देते हैं या जों जल्द ही ठीक हो जाते हैं को इस प्रकार के फेफड़ों से सम्बन्धित लक्षण बहुत कम देखने को मिलते हैं।
एक शोधकर्ता का मानना है कि इस प्रकार के रोगियों में अभी और अध्ययन की आवश्यकता है। अतः उनके बारे में अभी कुछ कहा नहीं जा सकता है।