कोरोना के कारण आने वाले सालों में लाखों लोगों को हो सकता है पार्किंसंस रोग, स्टडी में हुआ खुलासा

Long Covid and Parkinson's: कोरोना ने हर किसी को अलग-अलग तरीके से प्रभावित किया है। ऐसे में एक स्टडी की मानें तो, आगे चल कर कोरोना पीड़ितों में पार्किंसंस रोग का खतरा बढ़ सकता है।

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Written By: Pallavi Kumari | Published : May 23, 2022 9:09 AM IST

Long COVID: कोरोना वायरस होने के बाद ज्यादातर लोग और हेल्थ एक्सपर्ट इसके लंबे समय तक रहने वाले प्रभावों (long covid symptoms)के बारे में बात कर रहे हैं। साथ ही अलग-अलग यूनिवर्सिटी में इसे लेकर शोध चल रहे हैं। हाल ही में कोविड के लॉग टर्म प्रभावों पर थॉमस जेफरसन यूनिवर्सिटी और न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक स्टडी की है। इस अध्ययन में पार्किंसंस रोग को कोरोना से जोड़ कर देखा गया है और बताया जा रहा है कि आने वाले कुछ सालों में पार्किंसंस (Long covid and parkinson's in hindi) रोग बढ़ सकता है। एक्सपर्ट ने अध्ययन में, यह समझने की कोशिश की है कि कैसे SARS-CoV-2 किसी व्यक्ति के पार्किंसंस रोग के जोखिम को बढ़ा सकता है।

कोराना और पार्किंसंस रोग का खतरा-Covid-19 may increase risk of Parkinson

रिपोर्टों के अनुसार, 1918 के स्पैनिश फ्लू महामारी के कुछ वर्षों के बाद, दुनिया भर के डॉक्टरों ने पार्किंसंस रोग के नए मामलों में वृद्धि देखी। शोधकर्ताओं का दावा है कि जापानी इंसेफेलाइटिस से लेकर एचआईवी तक कई अन्य वायरल संक्रमणों को पार्किंसंस के बढ़ते जोखिम से जोड़ा गया है। जब 2020 में चल रहे कोरोनावायरस महामारी की शुरुआत हुई, तो कई वैज्ञानिकों ने आने वाले वर्षों में न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारी में संभावित स्पाइक की चेतावनी दी थी। 1918 की महामारी के लगभग पांच साल बाद, पार्किंसंस रोग तीन गुना बढ़ गए थे। इसी से इस बात कि संभावना है कि कोरोना के बाद लाखों लोगों को पार्किंसंस हो सकता है।

कोरोना वायरस बढ़ाता है न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारी का खतरा

अध्ययन के पहले लेखक रिचर्ड स्माइन की मानें तो ये "मल्टी-हिट परिकल्पना" कहा जाता है। स्मेने के अनुसार, एक वायरल संक्रमण सीधे न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारी का कारण नहीं बनता है, बल्कि यह मस्तिष्क को अन्य जोखिम कारकों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाता है जो रोग को ट्रिगर कर सकते हैं। इसलिए हम पार्किंसंस के लिए इसे एक 'मल्टी-हिट' परिकल्पना की तरह देख रहे हैं, जो कि लंबे समय तक लोगों को प्रभावित करने वाले रोगों का कारण बनता है।

स्टडी में ये भी बताया गया है कि वायरस सीधे तौप पर तो हमारे न्यूरॉन्स को नुकसान नहीं पहुंचाता है, लेकिन यह उन्हें दूसरी हिटके लिए अधिक संवेदनशील बनाता है। इस नए शोध में, वैज्ञानिकों ने कुछ मानव रिसेप्टर्स के साथ एक नया माउस मॉडल तैयार किया, ताकि इसे SARS-CoV-2 से संक्रमित किया जा सके। शोध में कोरोनोवायरस के संपर्क में आने वाले जानवरों पर स्टडी की गई है और न्यूरॉन क्षति के एक पैटर्न को भी समझा गया है। इस न्यूरॉन क्षति के कारण लोगों में पार्किंसंस जैसे रोग को देखा गया।

इसके अलावा, कुछ वैज्ञानिकों ने मानव मस्तिष्क में SARS-CoV-2 के निशान पाए हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि क्या यह ब्रेन स्मोग (brain smog) है या COVID-19 से जुड़े संज्ञानात्मक गिरावट जैसे मुद्दों के कारण हो सकता है। बता दें कि वैज्ञानिकों ने कोरोनोवायरससंक्रमित चूहों के बेसल गैन्ग्लिया में माइक्रोग्लिया (Microglia) की बढ़ी हुई मात्रा का पता लगाया। माइक्रोग्लिया एक प्रकार की मस्तिष्क प्रतिरक्षा कोशिका है जो असामान्य रूप से सक्रिय होने पर नुकसान पहुंचा सकती है। तो, भले ही कोरोना एक खत्म हो जाए,लेकिन इसके लॉग टर्म इफेक्ट्स लंबे समय तक लोगों में देखे जा सकते हैं।

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