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Written By: Editorial Team | Published : July 23, 2018 6:49 PM IST
जम्मू एवं कश्मीर के बांदीपुर जिले की रहने वाली दुर्लभ लिवर बीमारी से पीड़ित दस वर्षीय फातिमा को नई दिल्ली के इन्द्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल में एक नई जिंदगी मिली। फातिम को लिवर प्रत्यारोपण की जरूरत थी, जिसके लिए अस्पताल ने सोशल मीडिया पर अभियान चलाकर करीब 18 लाख रुपये जुटाए, जिसके बाद बच्ची की सर्जरी को सफलतार्पूक अंजाम दिया गया।
इन्द्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल ने एक बयान में कहा, "बच्ची लिवर की दुर्लभ बीमारी से पीड़ित थी, जो दो लाख लोगों में से सिर्फ एक व्यक्ति को ही होती है। जांच करने पर पता चला कि बच्ची को ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस है, अगर समय पर इलाज नहीं किया जाता तो कुछ ही हफ्तों में बच्ची की जान भी जा सकती थी।"
अपोलो हॉस्पिटल्स के ग्रुप मेडिकल डायरेक्टर और सीनियर कन्सलटेन्ट, पीडिएट्रिक गैस्ट्रोएन्ट्रोलोजी डॉ. अनुपम सिब्बल ने कहा, "बच्ची बेहद गरीब मजदूर परिवार से थी। वह छठी कक्षा में पढ़ती है और स्कूल में उसे पीलिया (जॉन्डिस) हो गया था। जांच करने पर पता चला कि वह क्रोनिक लिवर रोग से पीड़ित है जो लिवर फेलियर में बदल चुका था। मरीज को चार महीनों में तीन बार श्रीनगर के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन दिन-ब-दिन बिगड़ती हालत ने चिकित्सकों के लिए परेशानी खड़ कर दी।"
डॉ. सिब्बल ने बताया, "इस बीमारी में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) खुद ऐसे एंटीबॉडीज बनाने लगती है जो लिवर को नुकसान पहुंचाते हैं। शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली वायरस, बैक्टीरिया एवं अन्य पैथोजन्स पर हमला करने के बजाए लिवर की कोशिकाओं पर ही हमला करने लगती है, जिससे लिवर में सूजन आ जाती है और लिवर को बहुत अधिक नुकसान पहुंचता है।"
लिवर ट्रांसप्लान्ट एंड हेपेटोबाइलरी, पैनक्रियाटिक सर्जरी विभाग के सीनियर कन्सलटेन्ट डॉ. नीरव गोयल ने कहा, "मरीज को गंभीर पीलिया था, उसके पेट में पानी भर गया था और लिवर को खून पहुंचाने वाली खून की नलियों में प्रेशर बहुत ज्यादा था। उसका लिवर सिकुड़ चुका था। इलाज के बावजूद कोई सुधार नहीं हो रहा था, पेट में पानी भरना जारी था। बच्ची बहुत ज्यादा बीमार थी और उसे बचाने के लिए लिवर ट्रांसप्लान्ट ही एकमात्र तरीका था।"
डॉ. सिब्बल ने कहा, "बच्ची की हालत देखते हुए हमने लिवर प्रत्यारोपण सर्जरी करने का फैसला लिया। मरीज के पिता 48 वर्षीय सईद हुसैन ने उसे अपना लिवर डोनेट किया। सर्जरी 12 घंटे तक चली और अब उसके सभी लिवर फंक्शन टेस्ट नॉर्मल हैं, वह अपने घर लौट सकती है।"
आंखों में आंसू और चेहरे पर मुस्कान लिए मरीज के पिता सईद हुसैन ने कहा, "हम बेहद गरीब और अनपढ़ हैं। हमारे पास प्रत्यारोपण का पैसा नहीं था। हालांकि हमारे कुछ रिश्तेदार और दोस्त मदद के लिए आगे आए और उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए सर्जरी के लिए पैसे जुटाए। लेकिन फिर भी हम पर्याप्त धनराशि नहीं जुटा पाए थे, इतना खर्चा तो इस शहर में रहने और ट्रांसप्लान्ट के बाद दवाओं में ही हो जाता। लेकिन अपोलो हॉस्पिटल ने हमसे सर्जरी के लिए कोई फीस नहीं ली और हमारी बच्ची को पूरी तरह से ठीक कर दिया है।"
अपोलो लिवर प्रोग्राम के तहत अब तक 3100 से अधिक ट्रांसप्लान्ट किए जा चुके हैं, जिनमें 295 बच्चे शामिल हैं।
स्रोत: IANS Hindi.
चित्रस्रोत: IANS.