वर्ल्‍ड मेंटल हेल्‍थ डे : मेंटल हेल्‍थ के लिहाज से नाजुक है ये उम्र, ऐसे रखें अपने लाडलों का ख्‍याल

टीनएज में सिर्फ शारीरिक बदलाव ही नहीं होते, बल्कि मन और मस्तिष्‍क को भी करना पड़ता है बदलावों का सामना।

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Written By: Yogita Yadav | Published : October 10, 2018 10:18 AM IST

बचपन से किशोरावस्‍था की दहलीज पार करने की उम्र सबसे ज्‍यादा संवेदनशील उम्र मानी जाती है। इस उम्र में जितने शारीरिक बदलाव होते हैं, उससे ज्‍यादा होते हैं मानसिक बदलाव। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी इस उम्र को सबसे ज्‍यादा नाजुक मानता है। अभी हाल ही में आई एक रिपोर्ट ने तो और भी ज्‍यादा चौंकाने वाला खुलासा किया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में मानसिक बीमारी से जूझ रहे 50 फीसद लोग किशोरावस्था में ही इस बीमारी की जकड़ में आ जाते हैं। इसलिए जरूरी है कि उम्र के इस नाजुक दौर में अपने बच्‍चों के मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य का ख्‍याल रखें।

बदल रहा है समय, बढ़ रहीं हैं मुश्किलें

भागदौड़ भरी जिंदगी और मॉडर्न लाइफ स्टाइल हमारे बच्चों के स्वास्थ्य पर भी तेजी से नकारात्मक प्रभाव छोड़ रही है। इसके गंभीर परिणाम उनकी युवावस्था में सामने आते हैं। इसका नतीजा कई बार आत्महत्या या गंभीर मानसिक बीमारी के रूप में सामने आता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट के अनुसार मानसिक बीमारियों से पीड़ित 50 फीसद लोगों में यह बीमारी किशोरावस्था में ही शुरू हो जाती है। फिर भी लोग इसे नजरअंदाज करते हैं। युवावस्था में इसके गंभीर परिणाम सामने आते हैं। इस रिपोर्ट में इस बात का भी खुलासा किया गया है कि हर चार में से एक व्यक्ति मनोरोग से पीड़ित है। 50 फीसद लोगों में 14 साल की उम्र में बीमारी की शुरुआत हो जाती है। बच्चों पर पढ़ाई का अत्यधिक दबाव भी मानसिक परेशानी का कारण बनता है।

यूं संभालें अपने लाडलों को

टीन एज में बच्‍चों के शरीर से ज्‍यादा मन का ख्‍याल रखने की जरूरत होती है। वे इस दौर में कई तरह के बदलावों से गुजर रहे होते हैं। इसके लिए जहां पेरेंट्स की जिम्‍मेदारी है वहीं टीचर्स और कोच की भी बहुत सी जिम्‍मेदारी उनके प्रति बनती है।

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गैजेट्स इस समय की जरूरत बन चुके हैं। इन्‍हें खारिज नहीं किया जा सकता। इसलिए जरूरी है कि बच्‍चों को इनका संतुलित इस्‍तेमाल करना सिखाएं। इसके लिए सबसे ज्‍यादा जरूरी है कि आप स्‍वयं भी वह नियमावली पूरी करें, जो आप अपने किशोर बच्‍चों के लिए तय कर रहे हैं।

कई शोधों में यह सामने आ चुका है कि डायट भी मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य पर बहुत ज्‍यादा असर डालती है। इसलिए जरूरी है कि बच्‍चों के पोषण का बहुत ख्‍याल रखें। घर का रूटीन और डायट प्‍लान ऐसा बनाएं कि उनमें फलों, सब्जियों और सलाद की पर्याप्‍त जगह रहे।

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यह देखा गया है कि मोबाइल व सोशल नेटवर्क पर अधिक समय देने से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है। इसलिए दो-तीन घंटे से अधिक समय तक मोबाइल व सोशल नेटवर्क साइट्स पर सक्रिय रहना मानसिक बीमारी का कारण बन सकता है।