... Read More
By clicking “Accept All Cookies”, you agree to the storing of cookies on your device to enhance site navigation, analyze site usage, and assist in our marketing efforts. Cookie Policy.
Written By: Yogita Yadav | Updated : November 29, 2018 5:14 PM IST
गोल्डमैन सैक्स के उपाध्यक्ष साल्वेन रिक्टर ने कहा कुछ फार्मा कंपनियां और खराब नीतियों की वजह से एड्स की बीमारी कम होने की बजाए बढ़ती ही जा रही है। © Shutterstock
इतने सालों की सतत जागरुकता और बचाव के प्रयास के बावजूद एड्स जैसी गंभीर बीमारी पर हम काबू नहीं पा सके हैं। इस प्रश्न को गंभीरता से लेते हुए गोल्डमैन सेक्स के उपाध्यक्ष साल्वेन रिक्टर ने एक विस्तृत विश्लेषणात्मक रिपोर्ट तैयार की है। जिसमें एड्स की गंभीरता, उसके बचाव के प्रयासों और टेस्ट के चक्रव्यूह जैसे कई गंभीर प्रश्न उठाए गए हैं।
यह भी पढ़ें - एचआईवी संक्रमित बच्चों से नफरत नहीं, प्यार कीजिए
क्या है गोल्डमैन सैक्स
गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) न्यूयॉर्क स्थित एक वैश्विक निवेश बैंक है जिसे “Wall Street’s Dealmaker” कहा गया है। इस फ़र्म की स्थापना 1869 में मार्क्स गोल्डमैन ने की और 1885 में इसका नाम बदलकर गोल्डमैन सैक्स हो गया जब गोल्डमैन के दामाद फ़र्म से जुड़े। यह दुनिया के शीर्ष निवेश बैंक के रूप में विख्यात है जिसके ग्राहकों में विश्व की सरकारें, व्यक्ति और निगम शामिल हैं। यह फ़र्म यू.एस. ट्रेज़री प्रतिभूतियों की एक प्रमुख डीलर भी है 1906 से इसने विभिन्न कंपनियों के आईपीओ को अंडरराइट किया है। वर्षों तक चली आंतरिक बहस के बाद गोल्डमैन सैक्स 1999 में सार्वजनिक हुई। शुरुआत में कंपनी का केवल 12% हिस्सा सार्वजनिक हुआ और बाद में और स्टॉक ऑफ़र होने के साथ इस प्रतिशत में वृद्धि हुई।
यह भी पढ़ेें - विश्व एड्स दिवस 2018 : तीस वर्ष बाद भी टेस्ट करवाने में शर्म महसूस करते हैं लोग
वे कारण जो नहीं होने दे रहे एड्स को कम
इंडिपेंडेंट मीडिया इंस्टीट्यूट के प्रोजेक्ट ग्लोबेटरोटर (Globetrotter) में प्रस्तुत विस्तृत रिपोर्ट में गोल्डमैन सैक्स के उपाध्यक्ष साल्वेन रिक्टर कहते हैं, “ 1 दिसंबर को हम 30वां विश्व एड्स दिवस मनाने जा रहे हैं। दुनिया भर के देशों में दवाओं की उपलब्धता और जागरूकता बढ़ने के बावजूद अब भी यह बीमारी लगातार बढ़ती जा रही है। जब तक बीमारी बनी रहती है, उसके लिए दवाओं की आवश्यकता बनी रहेगी। यदि आप इसका उपचार ढूंढते हैं, तो यह मरीजो के हित में होगा। हालांकि इसमें समय लग सकता है। पर वे फार्मा कंपनियां और उनके निवेशक तब क्या करेंगे जो अभी तक इन दवाओं का निर्माण और विक्रय कर रहे हैं। ऐसा लगता है एड्स की बीमारी कुछ लोगों के लिए सोने का अंडा देने वाली मुर्गी बन गई है। वे इसे तब तक जिंदा रखना चाहेंगे, जब तक वह उन्हें लाभ दे रही है। यह भी पढ़ें – नीमका जेल में बंद 15 कैदी एचआईवी पॉजिटिव
ऐसे हुई शुरूआत
1 दिसंबर को एक बार फिर से विश्व एड्स दिवस मनाया जाएगा। 1 9 87 में, संयुक्त राष्ट्र विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) में दो सार्वजनिक सूचना अधिकारियों ने इस तरह के दिवस को मनाए जाने का सुझाव दिया था। जिसे बाद में 1 9 88 से संयुक्त राष्ट्र द्वारा मान्यता दी गई। एक दशक तक, विश्व एड्स दिवस ने बीमारी की क्रूरता के बारे में सार्वजनिक चेतना के लिए कार्य किया। 1 99 0 तक प्रति वर्ष लगभग 300,000 लोग एड्स से मरे। जबकि लगभग 10 मिलियन लोग एचआईवी से पीड़ित थे। विश्व एड्स दिवस और कार्यकर्ता समूहों ने यह सुनिश्चित करने के लिए भी लड़ाई लड़ी कि एड्स को समलैंगिक पुरुषों पर अभिशाप के रूप में ही न देखा जाए। इसकी बजाए, इस बीमारी के इलाज और रोकथाम के प्रयास किए जाएं। समाज में होमोफोबिया और सार्वजनिक स्वास्थ्य में कटौती के कारण यह एक बड़ा संकट था, जो दुनिया भर के देशों को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की नीति के अंतर्गत मनाने को मजबूर किया जा रहा था। यह भी पढ़ें – एचआईवी का वाहक हो सकता है वन नाइट स्टैंड
तीस वर्ष में क्या रहा हासिल
2018 तक, विश्व एड्स दिवस की उत्पत्ति के 30 साल बाद भी यह माना जाता है कि इस बीमारी के बारे में बात करना अनैतिक है। एक मान्यता यह भी है कि होमोफोबिया कम खतरनाक है और हेल्थ केयर एवं मेडिकल इंडस्ट्री ने काफी हद तक बीमारी पर काबू पा लिया है। डब्ल्यूएचओ की आखिरी गिनती के अनुसार, 70 मिलियन से अधिक लोग एचआईवी वायरस से पीड़ित पाए गए। जबकि 2017 के अंत तक, 36.9 मिलियन लोग एचआईवी वायरस (दुनिया की आबादी का 1 प्रतिशत से कम) से ग्रसित हैं। यह सच है कि दुनिया के कई हिस्सों में, एचआईवी वायरस को रोकथाम और देखभाल की तकनीकों द्वारा नियंत्रण में लाया गया है। इसका एक पक्ष यह है कि संपन्न देशों में हेल्थ केयर का बुनियादी ढांचा अभी उतना खराब नहीं है। यहां के दवा उद्योग में वायरस को काबू करने वाली कुछ ज्यादा असरकारी दवाएं मौजूद हैं। एचआईवी से ग्रस्त 9.4 मिलियन लोग अपनी बीमारी से हैं अनजान : यूएनएड्स रिपोर्ट
खतरनाक है इन देशों में हालात
दुनिया के अन्य हिस्सों जैसे अफ्रीका और एशिया में एचआईवी वायरस बहुत खतरनाक स्थिति में है। अफ्रीकी महाद्वीप के बड़े हिस्से में 25 वयस्कों में से 1 एचआईवी से ग्रस्त है। 4 प्रतिशत वयस्कों से कुछ ऊपर। ये आंकड़ें पुरुष और महिलाएं सभी का दो-तिहाई हिस्सा बनाते हैं, जो एचआईवी वायरस से ग्रस्त हैं। इस बात पर ध्यान देना जरूरी है कि वे उन देशों में रहते हैं जहां आईएमएफ ने राज्य द्वारा प्रदत्त हेल्थ केयर खासतौर से प्राइमरी हेल्थ केयर को बहुत ज्यादा व्यवस्थित नहीं किया है1 यहां तक दवाओं की पहुंच भी बहुत सुलभ नहीं है। दुनिया के समृद्ध देशों में भले ही स्थिति उतनी चिंताजनक न हो, पर इन अविकसित और विकासशील देशों में हालात बहुत गंभीर हैं। जहां मेडिकल और फार्मा कंपनियां भी उपचार या निदान की बजाए टेस्ट ट्रायल ही चलाती रहती हैं।
याद कीजिए भारतीय पोस्टर
बहुत दिनों से यह मांग की जाती रही है कि दवाइयों के उपयोग से विभिन्न बीमारियों की रोकथाम और उपचार किया जा सके। 1 9 70 के दशक में भारतीय पोस्टर याद आते हैं, जिनमें सरकार की ओर से ये आग्रह किया जाता था कि पानी उबालकर पिएं या बच्चों का सही समय पर टीकाकरण करवाएं। ऐसा माना जाता था कि स्वास्थ्य के बारे में जागरुकता और प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल एवं शिक्षा ही एक बेहतर दुनिया का रास्ता है। अल्मा एटा (यूएसएसआर) में 1 9 78 के विश्व स्वास्थ्य संगठन सम्मेलन में, अधिकांश देशों की सरकारों ने कहा कि वर्ष 2000 तक स्वास्थ्य का स्तर लोगों को "सामाजिक और आर्थिक रूप से उत्पादक जीवन जीने की अनुमति देगा।" इस बात पर जोर दिया गया कि "प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल सामाजिक न्याय की भावना और विकास का लक्ष्य हासिल करने की कुंजी है।"
Disclaimer: The content on TheHealthSite.com is only for informational purposes. It is not at all professional medical advice. Always consult your doctor or a healthcare specialist for any questions regarding your health or a medical condition.