
आशु कुमार दास
आशु कुमार दास एक अनुभवी हेल्थ कंटेंट स्पेशलिस्ट हैं। इन्हें हेल्थ कंटेंट राइटर के तौर पर काम करते हुए 6 ... Read More
Written By: Ashu Kumar Das | Updated : May 6, 2026 8:52 AM IST
Rare Diseases
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के महानिदेशक डॉ. राजीव बहल ने कहा है कि भारत को दुर्लभ बीमारियों (Rare Diseases) के इलाज और पहचान के लिए केवल पश्चिमी देशों के तरीकों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत को अपनी जरूरतों के हिसाब से नए और अपने खुद के यानि की भारत निर्मित स्वदेशी मॉडल को तैयार करना होगा। 5 मई को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय दुर्लभ रोग सम्मेलन में बोलते हुए डॉ. राजीव बहल ने कहा कि भारत की बड़ी आबादी और अलग परिस्थितियों को देखते हुए यहां दुर्लभ रोगों के लिए जनसंख्या के आधार पर रणनीति, बीमारी की रोकथाम और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल करना जरूरी है।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डॉ. राजीव बहल ने कहा कि सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसे आधुनिक उपकरणों की मदद से दुर्लभ बीमारियों की जल्दी पहचान की जा सकती है। बीमारी की पहचान जल्दी होने पर मरीजों को न सिर्फ समय पर इलाज मिल सकेगा, बल्कि मृत्यु की दर को भी कम किया जा सकेगा। डॉ. बहल ने कहा कि 1990 के दशक में दुर्लभ बीमारियों की पहचान करना बेहद मुश्किल था और इलाज के विकल्प भी लगभग नहीं थे। लेकिन अब स्थिति काफी बदली है। आज सरकार मरीजों को आर्थिक मदद भी दे रही है। हालांकि इस दौरान उन्होंने इस बात को भी स्वीकार किया कि दुर्लभ बीमारियों का इलाज बहुत महंगा होने के कारण प्रति मरीज 50 लाख रुपये की आर्थिक मदद भी कम पड़ रही है।
उन्होंने कहा कि भारत सरकार का दुर्लभ रोग कार्यक्रम हजारों बच्चों और परिवारों के लिए उम्मीद बनकर सामने आया है। साथ ही उन्होंने देश के विभिन्न उत्कृष्टता केंद्रों (Centres of Excellence) की भी सराहना की, जो इन बीमारियों के इलाज और देखभाल में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
डॉ. बहल ने यह भी बताया कि ICMR दुर्लभ बीमारियों के इलाज के लिए नए प्रकार के डिवाइस और एडवांस टेक्नॉलजी पर काम कर रहा है। आईसीएमआर की इस पहल के तहत महंगी दवाओं के सस्ते विकल्प भारत में ही तैयार करने, यानी ‘इंडिजेनाइजेशन’ (स्वदेशीकरण) को बढ़ावा दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित मरीजों को आसान और सस्ता इलाज व दवाएं मिल सके, इसलिए उद्योग जगत के साथ मिलकर किफायती दवाओं के घरेलू उत्पादन पर जोर दिया जा रहा है।
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