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इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) ने पुणे सहित पूरे भारत के 42 अस्पतालों में भर्ती 29,509 मरीजों से प्राप्त डेटा का विश्लेषण किया और इससे कुछ हैरान कर देने वाली जानकारी सामने आई है। डेटा के मुताबिक, जिन लोगों को क्रॉनिक लिवर डिजीज थी और उनका जिनका वजन बहुत ज्यादा था उनमें संक्रमण से मौत का खतरा बहुत ज्यादा था। ये जोखिम कारक शरीर में दूसरी बीमारियों जैसे डायबिटीज, एडवांस एज, क्रॉनिक किडनी डिजीज, ट्यूमर और टीबी के कारण और ज्यादा घातक हो जाते हैं।
ICMR के महानिदेशक डॉ. समीरन पांडा ने एक अंग्रेजी वेबसाइट को दिए इंटरव्यू में बताया कि इस अध्ययन से ये पता चलता है कि अगर अस्पताल में भर्ती कोविड के मरीज ने वैक्सीन ली है और उसे मोटापा सहित कोई दूसरी स्वास्थ्य समस्यानहीं है तो उसे ठीक होने में कम समय लगेगा।
उन्होंने बताया कि बॉडी मास इंडेक्स को कोविड की गंभीरता से जोड़ने के लिए किए गए इस अध्ययन में शामिल 12,046 व्यक्तियों में से 60 फीसदी से अधिक लोग मोटे या अधिक वजन वाले थे। इतना ही नहीं 7,307 मोटे / अधिक वजन वाले रोगियों में से लगभग 10 फीसदी ने इलाज के दौरान कोविड से दम तोड़ दिया। इससे पता चलता है कि मोटे व्यक्तियों में कोविड की गंभीरता की संभावना अधिक होती है और ये एक ऐसा पहलू जिस पर अब तक ध्यान नहीं दिया गया है। इसलिए मोटापे को भी कोमोर्बिटडिटी का एक रूप माना जाना चाहिए।
इस विश्लेषण में ये पाया गया कि इन 42 अस्पतालों में भर्ती मरीज, जिन्होंने भले ही कोई सी भी कोविड वैक्सीन ली हो उन्हें मौत का खतरा कम हो जाता है। बता दें वैक्सीन की एक डोज लेने वालों में मौत का खतरा 50 फीसदी और दोनों डोज लेने वालों में 60 फीसदी तक खतरा कम पाया गया है। डॉ पांडा कहते हैं कि कोविड वैक्सीन की कम से कम एक डोज लेने से मृत्यु दर में 13 फीसदी की कमी देखी गई है जबकि वैक्सीन नहीं लेने वाले लोगों में मृत्यु दर 22 फीसदी तक बढ़ी हुई पाई गई है।
आईसीएमआर द्वारा किया गया ये विश्लेषण 1 सितंबर, 2020 से 26 अक्टूबर, 2021 तक भारत के 42 अस्पतालों में भर्ती मरीजों पर किया गया था। आईसीएमआर के इस अध्ययन में 27,251 रोगियों का डेटा शामिल है, जिसमें से कुछ की मृत्यु और कुछ को डिस्चार्ज करने का डेटा उपलब्ध है।
डॉ पांडा ने कहा कि ये अध्ययन भारत में एक बड़े सैंपल साइज में किया गया और ये अध्ययन दिखाता है अन्य देशों के मुकाबले भारत में रोग कितनी तेजी से फैला था।
उन्होंने कहा कि हमने पाया कि जिन लोगों को स्वास्थ्य में सुधार होने के बाद अस्पतालों से छुट्टी दे दी गई थी, उनमें से अधिक लोगों ने वैक्सीन ली हुई थी। इससे फर्क नहीं पड़ता कि वैक्सीन कौन सी थी लेकिन कोवैक्सिन या कोविशील्ड की कम से कम एक डोज लेना जरूरी था।
वैक्सीनेशन की स्थिति के आधार पर कोविड की गंभीरता की प्रवृत्ति का पता लगाने के लिए समूह में कुछ लोगों का भी अध्ययन किया गया। अध्ययन के परिणामों से ये पता चला कि करीब 5964 रोगियों ने वैक्सीन नहीं ली थी, जिसमें से 22% की अस्पताल में मृत्यु हो गई। हालांकि, 550 लोग ऐसे थे जिन्हें वैक्सीन की एक डोज लगी थी और उनमें से 15 फीसदी ने अपनी जान गंवाई। जबकि दो डोज लेने वाले 305 रोगियों में से 9 फीसदी ने अपनी जान गंवाई।
डॉ. पांडा का कहना है कि इससे वैक्सीन से जुड़ी शुरुआती चिंताओं को दूर करना चाहिए क्योंकि ये बीमारी के गंभीर रूप और मृत्यु को टालने में मदद करते हैं। डायबिटीज, ट्यूमर और टीबी वाले रोगियों, जिन्होंने वैक्सीन ली थी उनमें मृत्यु दर भी काफी कम थी।