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अगर आप सोचते हैं कि मंकीपॉक्स का पता लगाने के लिए कुछ विशिष्ट तरीके हैं तो आप बिल्कुल गलत हैं। दुनिया भर के एक्सपर्ट्स का कहना है कि बढ़ते असामान्य लक्षणों से ये मतलब है कि वायरस पूरी तरह से पकड़ में नहीं आने वाला और यौन संचारित रोग नहीं है। भारत में मंकीपॉक्स के पहले गंभीर मामले का पता लगाने वाले इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च -नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (ICMR-NIV) के शोधकर्ताओं ने एक नई स्टडी में मामलों का पता लगाने के संदिग्धता की ज्यादा से ज्यादा जांच करने की जरूरत पर जोर दिया है। इतना ही नहीं शोधकर्ताओं ने छिपे हुए संकेतों को भी पहचानने की बात कही है।
इसके अलावा शोधकर्ताओं ने नाक, गले और जरूरत पड़ने पर पेशाब की जांच करने की भी सलाह दी है क्योंकि मंकीपॉक्स के गंभीर मामलों की बात करें तो इसमें स्किन पर रैशेज नहीं होते हैं।
मंकीपॉक्स पर अपनी विस्तृत रिपोर्ट में आईसीएमआर की स्टडी में इस बात का जिक्र किया गया है कि इस इंफेक्शन में बार-बार अपने आप ही असामान्य लक्षण और जटिलताएं दिखाई देती हैं, जो पहले की महामारियों और मामलों की तुलना में बिल्कुल अलग हैं, खासकर उन जगहों पर जहां, ये बीमारी स्थानिक थी। शोधकर्ताओं ने जोर देकर कहा कि जब डॉक्टर्स संदिग्ध मामलों की जांच कर रहे हों तो उन्हें इन सब बातों का ध्यान रखना चाहिए, खासकर उन जगहों पर जहां बीमारी के फैलने की संभावना बहुत ज्यादा हो।
13 सितंबर को रिसर्च स्क्वायर में प्रस्तुत निष्कर्षों 'केरल में मंकीपॉक्स वायरस का गंभीर मामला' पर शोधकर्ताओं का कहना है कि मंकीपॉक्स का पता लगाने के लिए रोगी पर बारीकी से नजर रखने की जरूरत है, खासकर उन मामलों में जहां रोगी में असामान्य लक्षण दिखाई देते हैं। इसके अलावा बुखार के साथ दूसरे लक्षणों का संबंधों का भी पता लगाने की कोशिश की जा रही है।
भारत में अभी तक मंकीपॉक्स के कुल 11 मामले सामने आए हैं, जिसमें से केरल में 5 और दिल्ली में छह लोग इसका शिकार हुए हैं। नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल के निदेशक डॉ. सुजीत सिंह का कहना है कि मंकीपॉक्स के 300 से ज्यादा संदिग्ध मामलों की जांच की जा चुकी है, जिसमें से किसी में भी इंफेक्शन के होने की पुष्टि नहीं हुई है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दुनियाभर में 2022 के अंदर कुल 52000 कुल मंकीपॉक्स के मामलों की पुष्टि की है और अभी तक 15 लोगों की इस वायरस से मौत हो चुकी है।