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Written By: Yogita Yadav | Published : November 27, 2018 6:27 PM IST
बच्चों की हड्डियां 18 साल की उम्र तक नर्म होती हैं और रीढ़ की हड्डी भारी वजन सहने लायक मजबूत नहीं होती। स्कूल में पढ़ने वाले 60 प्रतिशत बच्चे जोड़ों में दर्द, 30 प्रतिशत बच्चे कमर दर्द व 58 प्रतिशत बच्चे हड्डी रोग से पीड़ित हैं। © Shutterstock.
अभी हाल ही में मानव संसाधन मंत्रायल भारत सरकार ने बच्चों के स्कूल बैग के वजन संबंधी आदेश पारित किया है। इसके अनुसार अब कोई भी स्कूल बच्चों को तय सीमा से ज्यादा भारी बैग लाने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। स्वभाविक है अब स्कूलों को टाइम टेबल भी ऐसा ही बनाना होगा जिसमें बच्चों को एक दिन में ज्यादा किताबें या कापियां न ले जानी पड़ें। इसके लिए स्कूल प्रशासन द्वारा किताबें स्कूल में ही जमा करने जैसी वैकल्पिक व्यवस्था पर भी विचार किया जा सकता है।
ये है बस्ते का निर्धारित वजन
भारी बैग का ये होता है बच्चों की सेहत को नुकसान
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों को भारी वजन के कारण पीठ दर्द और मांसपेशियों की समस्याओं व गर्दन दर्द से जूझना पड़ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों की हड्डियां 18 साल की उम्र तक नर्म होती हैं और रीढ़ की हड्डी भारी वजन सहने लायक मजबूत नहीं होती। स्कूल में पढ़ने वाले 60 प्रतिशत बच्चे जोड़ों में दर्द, 30 प्रतिशत बच्चे कमर दर्द व 58 प्रतिशत बच्चे हड्डी रोग से पीड़ित हैं। यह भी पढ़ें - जानें प्रीमेच्योर बेबी केयर की ‘एबीसीडीडीएच’
भारी बैग के चलते बच्चों को रीढ़ की हड्डी के नुकसान के साथ-साथ फेफड़ों की समस्याएं होने की संभावनाएं भी होती हैं और इससे उन्हें सांस लेने में दिक्कत जैसी कई समस्याएं हो सकती हैं। साथ ही भारी स्कूल बैग लेने से हाथों में झुनझुनी और कमजोरी होने लगती है। इससे बच्चों की नसें भी कमजोर हो जाती है। इसके अलावा आजकल बच्चों में एक कंधे पर बैग को टांगे रखने का फैशन है। जिसके चलते एक कंधे पर बैग टांगे रहने से वन साइडेड पेन शुरू हो जाता है। इजरायली शोधकर्ताओं ने विकसित किया ऑटिज़्म को रोकने का उपचार
क्या कहता है शोध
हाल ही में हुए एक शोध ने इस तथ्य को पुख्ता किया कि बस्ते का भारी बोझ स्वास्थ्य पर खराब असर डालता है। इसमें कहा गया है कि भारी बस्ता उठाने वाले सात से 13 वर्ष की आयुवर्ग के 68 प्रतिशत स्कूली बच्चों को पीठ दर्द की शिकायत हो सकती है या उनको कूबड़ निकल सकता है। एसोचैम की स्वास्थ्य समिति के अध्यक्ष बी के राव के अनुसार इन बच्चों को स्लिप डिस्क, स्पॉंडिलाइटिस, पीठ में लगातार दर्द, रीढ़ की हड्डी का कमजोर होने और कूबड़ निकलने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।