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Written By: akhilesh dwivedi | Published : August 22, 2018 2:13 PM IST
Antibiotics-Test-kit
दुनिया में तमाम तरह की बीमारियों का सबसे आसान उपचार एंटीबॉयोटिक दवाओं के द्वारा किया जाता है। दवा के कारोबार में बहुत पहले से नकली दवाओं का कारोबार होता रहा है। हाल ही में अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्थ कैरोलिना (यूएनसी) के शोधकर्ताओं के एक अध्ययन में पता चला कि अफ्रीका में इस्तेमाल में लायी जा रही 19 प्रतिशत जरूरी दवाएं नकली या खराब गुणवत्ता की थीं। शोधकर्ताओं ने पाया कि कम और मध्यम आय वाले देशों में 19 प्रतिशत मलेरिया रोधी और 12 प्रतिशत एंटीबॉयोटिक दवाएं नकली या खराब गुणवत्ता की थीं।
नकली दवा के खतरे से बचने के लिए अमेरिका के वैज्ञानिकों नें एंटीबॉयोटिक दवाओं के लिए एक पेपर-आधारित परीक्षण विकसित किया है। यह परीक्षण मिनटों के भीतर नकली या घटिया दवाओं का पता लगा सकता है। अमेरिका में कोलोराडो स्टेट यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों द्वारा बनाया गया यह डिवाइस सरल और सस्ता है।
शोधकर्ताओं ने एक पेपर-आधारित डिवाइस बनायी है जो जल्दी से निर्धारित कर सकती है कि एंटीबॉयोटिक दवा असली है या नकली। यह डिवाइस प्रेगनेंसी टेस्ट कीट की तरह ही काम करने वाली है।
इस कीट को बनाने में शोधकर्ताओं ने बीटा-लैक्टैमेस नामक इस एंजाइम का इस्तेमाल किया है। असली-नकली की पहचान करने के लिए एंटीबॉयोटिक को पानी में घोलकर, घोल को पेपर डिवाइस में डालते हैं। डीवाइस में प्रयोग किये गये पेपर में नाइट्रोसेफिन अणु होता है जो एंजाइम की प्रतिक्रिया पर रंग बदलता है। एंटीबॉयोटिक के कैमिकल जब नाइड्रोसेफिन से मिलते हैं तो रंग में परिवर्तन होता है।
डीवाइस में जब एंटीबॉयोटिक घोल को डालते हैं तो रंग में बदलाव असली नकली की पहचान कर देता है। अगर रंग में थोड़ा परिवर्तन होता है तो दवा असली होती है। अगर गहरा लाल रंग हो जाता है तो एंटीबायोटिक नकली होती है।
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नकली दवाओं से कोई लाभ न होने के साथ- साथ लंबी बीमारी और शरीर में जहर फैलने का खतरा है। उन्होंने कहा कि इस समस्या पर वैश्विक समाधान की आवश्यकता है, जिससे कि सही दवाओं की सप्लाई सुनिश्चित की जाए और दवाओं के बारे में सही जानकारी साझा हो सके। इसके अलावा दवाओं की गुणवत्ता और निगरानी के लिए अंतर्राष्ट्रीय कानूनों की आवश्यकता है।
चित्रस्रोत:Shutterstock.