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Written By: Jitendra Gupta | Updated : May 16, 2022 10:39 AM IST
टाइप-2 डायबिटीज का खतरा बढ़ाती है शरीर में मौजूद ये चीज! वैज्ञानिकों ने लगाया पता क्यों भारतीयों को सबसे ज्यादा खतरा
बहुत से लोगों के मन में ये सवाल रहता है कि आखिर डायबिटीज की सबसे बड़ी वजह क्या है। बहुत से लोग इसे जीवनशैली से जुड़ा विकार मानते हैं तो बहुत से लोग इसे अनहेल्दी आदतों की वजह से होने वाली समस्या। हाल ही में भारतीय वैज्ञानिकों सहित दुनियाभर के अलग-अलग देशों के वैज्ञानिकों ने एक वैश्विक अध्ययन में इस बात पर प्रकाश डाला है कि कैसे हमारे जीन टाइप-2 डायबिटीज में योगदान देते हैं।नेचर जेनेटिक में प्रकाशित DIAMANTE (डायबिटीज मेटा एनालिसिस ऑफ ट्रांस-एथनिक एसोसिएशम स्टडी) नाम के इस अध्ययन को यूनिवर्सिटी ऑफ मेनचेस्टर के प्रोफेसर और अध्ययन के सह मुख्य लेखक एंड्रयू मोरिस ने किया है।
बता दें कि बीते तीन दशक से ज्यादा वक्त में टाइप-2 डायबिटीज की वैश्विक दर चार गुना तक हो गई है। टाइप-2 डायबिटीज एक ऐसी बीमारी है, जिसके कारण दूसरी बीमारियां आपकी जान के लिए मुसीबत बन सकती है। डायबिटीज के सबसे ज्यादा मामले भारत और चीन सहित एशिया से सामने आते हैं।
कई अध्ययन में ये साफ हो चुका है कि भारतीय टाइप-2 डायबिटीज के प्रति सबसे ज्यादा संवेदनशील होते हैं क्योंकि यहां रहने वाले लोग ज्यादातर पेट और कमर के आस-पास चर्बी जैसी समस्या से ग्रस्त होते हैं, जो उनके पेट के अंगों पर जमा फैट को दर्शाता है। इतना ही नहीं भारतीय जन्म से ही इंसुलिन रेजिस्टेंट होते हैं। ये स्थिति यूरोपीय देशों के ठीक विपरीत है, जहां लोग जरूरत से ज्यादा वजन से ग्रस्त हैं। इसके बावजूद टाइप-2 डायबिटीज के जेनेटिक आधार पर हुए ढेर सारे अध्ययनों में यूरोपीय देश काफी पीछे हैं।
भारत के इस अध्ययन के मुख्य शोधकर्ता और सीएसआईआर के सेंटर फॉर सेलयुलर एंड मॉलिकुलर बायोलॉजी के मुख्य वैज्ञानिक डॉ. गिरीराज आर. चंडाक ने इस अध्ययन को एक ऐतिहासिक क्षण करार दिया, जिसमें दुनियाभर के वैज्ञानिक साथ मिलकर अलग-अलग आबादी में टाइप-2 डायबिटीज को लेकर जेनेटिक संदिग्धता में विभिन्नताएं और समानताएं को बेहतर तरीके से समझने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
उनके शोध ने ये दर्शाया था कि भारतीयों में यूरोपीय देशों के लोगों के मुकाबले जेनेटिक विविधता बहुत ज्यादा है, जिसकी वजह से यूरोपीय डेटा का प्रयोग कर भारतीय आबादी में टाइप-2 डायबिटीज का पता लगाना बहुत ही मुश्किल है।
हाल ही में हुए इस अध्ययन में यूरोपीय, पूर्वी एशियाई, दक्षिण एशियाई, अफ्रीकी और हिस्पैनिक्स जैसे पांच जातीय समूहों के 11.6 लाख हेल्दी लोगों के जीनोमिक डीएनए की तुलना 1.8 लाख टाइप-2 डायबिटीज से पीड़ित लोगों से की गई। शोध में ये पाया गया कि मरीजों और हेल्दी लोगों के बीच जेनेटिक विविधता बहुत बड़ी संख्या में थी।