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Written By: Editorial Team | Published : April 27, 2018 12:57 PM IST
उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने 15वें विश्व ग्रामीण स्वास्थ्य सम्मेलन 2018 का उद्घाटन करते हुए कहा कि देश में डॉक्टर-मरीज का गिरता अनुपात, स्वास्थ्य सेवाओं की खराब स्थिति, स्वास्थ्य सेवाओं की कम उपयोगिता, कुशल पैरामेडिक का अभाव और खराब बुनियादी सुविधाएं सबसे बड़ी समस्याएं हैं। भारत में पहली बार आयोजित इस चार दिवसीय सम्मेलन में 40 से अधिक देशों के हजारों विदेशी प्रतिनिधि, मेडिकल प्रैक्टिसनर्स और प्रोफेशनल प्रशिक्षु हिस्सा लेंगे। यह सम्मेलन 26 अप्रैल से 29 अप्रैल तक चलेगा।
उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने कहा, "70 साल की आजादी के बाद भी भारत की 52 फीसदी आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है और समग्र रूप से उनके विकास को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। डॉक्टर-मरीज का गिरता अनुपात, स्वास्थ्य सेवाओं की खराब स्थिति और स्वास्थ्य सेवाओं की कम उपयोगिता, कुशल पारामेडिक का अभाव और खराब बुनियादी सुविधाएं इस क्षेत्र की बड़ी समस्याएं हैं। भारत सरकार ग्रामीण स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता पर रखकर काम कर रही है।"
उन्होंने कहा, "निजी क्षेत्रों, एनजीओ और डॉक्टरों के संगठन समेत सभी अंश धारकों की सक्रिय भागीदारी ग्रामीण क्षेत्रों पर केंद्रित होनी चाहिए। दुनिया में स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण की दिशा में भारत भी सबसे तेजी से उभरता क्षेत्र है, जहां स्वास्थ्य सेवाओं पर 72 फीसदी खर्च निजी क्षेत्र में ही होता है।"
रूरल वॉन्का के अध्यक्ष डॉ. जॉन विन ने कहा, "दुनिया में ग्रामीण स्वास्थ्य एक बड़ा मसला है और ज्यादातर ग्रामीणों और उनकी स्वास्थ्य जरूरतें मुख्य मुद्दे हैं। इस सम्मेलन का उद्देश्य 2030 (एसडीजी3) तक स्थायी विकास लक्ष्य हासिल करना है।"
एएफपीआई के आयोजक और राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. रमण कुमार के अनुसार, "ग्रामीण और प्राथमिक स्वास्थ्य चिकित्सा में सुधार पर ध्यान केंद्रित करना एक गंभीर मुद्दा बन गया है, जो स्वास्थ्य सेवाओं के प्रावधान के संदर्भ में देश की एक एक बड़ी चुनौती है। इस तरह का सम्मेलन, खासकर भारत में जहां 70 फीसदी आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है, सभी आयुवर्ग के लोगों की सेहत को प्रोत्साहित करेगा। प्राथमिक स्वास्थ्य संरचना में शोध एवं संशोधन की पद्धति के जरिये सरकार का सुधारात्मक कदम न सिर्फ स्वास्थ्य के क्षेत्र में सुधार लाएगा, बल्कि देश के समग्र विकास में भी महत्वपूर्ण होगा।"
इस सांस्कृतिक कार्यक्रम में दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन दूसरे और तीसरे दिन पुरस्कार वितरित करेंगे।
एएफपीआई, नई दिल्ली के प्रदेशाध्यक्ष डॉ. अंकित ओम ने बताया, "ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों के अभाव पर लंबे समय से चर्चा होती रही है, जो बहुत हद तक सही नहीं है। जिस देश में जहां सालाना 60 हजार एमबीबीएस डॉक्टर तैयार होते हैं, वहां प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के लिए बमुश्किल 1700 भर्तियां की जाती हैं। भारत में 200 से ज्यादा फार्मास्यूटिकल कंपनियां पंजीकृत हैं, लेकिन मरीज अभी भी मेडिसिन के लिए सरकारी सेक्टर पर निर्भर रहते हैं। सरकारी नीतियों को इस तरह तैयार किया जाना चाहिए कि कम से कम दवाइयां भी सिर्फ सरकारी केंद्रों और निजी केंद्रों पर सब्सिडाइज्ड मूल्यों पर उपलब्ध हो सकें।"
स्रोत:IANS Hindi
चित्रस्रोत:Shutterstock.