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Written By: Agencies | Published : October 30, 2014 4:18 PM IST
इजरायल यूनिवर्सिटी में शोध में जुटी टीम को उम्मीद है कि इबोला से उबर चुके मरीजों के शरीर से अलग किए गए प्रतिलोम (एंटीबॉडी) तत्वों की मदद से अगले पांच साल में इबोला की वैश्विक दवा तैयार कर ली जाएगी। पश्चिम अफ्रीका में फैली इबोला महामारी के बारे में इजरायल के बेन-गुरियन यूनिवर्सिटी के वायरोलॉजिस्ट लेस्ली लोबेल का कहना है कि कभी न कभी यह तो होना ही था। समाचार एजेंसी एफे के अनुसार, लोबेल पिछले 12 सालों से इजरायल यूनिवर्सिटी की लैबोरेटरी में युगांडा के वायरस रिसर्च इंस्टीट्यूट के साथ समन्वय से घातक इबोला वायरस पर शोध कर रहे हैं।
उनके शोध का केंद्र इबोला संक्रमण से उबर चुके मरीजों का अध्ययन कर यह पता लगाना रहा है कि किस तरह उनका शरीर वायरस का प्रतिरोध करने में सक्षम हुआ। लोबेल ने पता लगाया कि मानव मोनोक्लोनल एंटीबॉडी तत्व वायरस को निष्प्रभावी करने में सक्षम हैं और इसकी मदद से इबोला की दवा विकसित की जा सकती है। लोबेल ने समाचार एजेंसी एफे को बताया, 'पिछले चार साल में हमने कई सारे मानव एंटीबॉडी का अध्ययन और उन्हें एकत्र किया, जो इबोला और मारबर्ग हेमोरेजिक फीवर वायरस को निष्प्रभावी कर सकती हैं।' लोबेल की टीम को उम्मीद है कि इबोला से उबर चुके मरीजों से ली गई एंटीबॉडी की मदद से अगले पांच सालों में इबोला की वैश्विक दवा तैयार कर ली जाएगी।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी यह आशा जताई है कि वर्तमान में फैली महामारी की दवा 2015 की शुरुआत तक तैयार हो जाएगी, जिसे अफ्रीका में इस्तेमाल किया जा सकेगा, लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि इसकी घोषणा जल्दबाजी होगी।
स्रोत: IANS Hindi
चित्र स्रोत: Getty images
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