डॉ. हर्षवर्धन ने राष्ट्रीय दृष्टिहीनता रोकथाम कार्यक्रम तेज करने का किया फैसला

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Written By: Agencies | Published : October 20, 2014 12:32 PM IST

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने राष्ट्रीय दृष्टिहीनता रोकथाम कार्यक्रम (एनपीसीबी) को तेजी से लागू करने के उद्देश्य से इसमें हुई प्रगति की समीक्षा करने का फैसला किया है। हर साल 9 अक्टूबर को मनाए जाने वाले विश्व दृष्टि दिवस के बारे में बातचीत के दौरान उन्होंने बेंगलुरू में कहा कि वह 12वीं पंचवर्षीय योजना अवधि (2012-17) में एनपीसीबी के लिए निर्धारित राशि का अधिक से अधिक उपयोग सुनिश्चित करेंगे और इस बारे में राज्य सरकारों से भी बात करेंगे। दृष्टिहीनता की रोकथाम के लिए शत-प्रतिशत केंद्र द्वारा वित्त पोषित योजना एनपीसीबी 1976 में शुरू की गई थी।

उन्होंने कहा कि 28 साल बीत जाने के बाद भी स्थति में उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ है। 2006-07 में किए गए सर्वेक्षण के मुताबिक, रोकी जा सकने वाली दृष्टिहीनता में साल 2000 में 1.1 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो रही थी जो साल 2006 में घटकर 1 प्रतिशत रह गई। एनपीसीबी का लक्ष्य 2020 तक दृष्टिहीनता की मौजूदा दर को 1 प्रतिशत के स्तर से घटाकर 0.3 प्रतिशत करना है। देहदान की प्रतिज्ञा ले चुके स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि सरकार नेत्रदान की अवधारणा को बढ़ावा देने के लिए गैर सरकारी संगठनों के साथ मिलकर काम करेगी। उन्होंने कहा कि 'नेत्र दान करने वालों की सदइच्छा को पूरा करने में उनके परिवारों और आईबैंकों की तरफ से कई खामियां बरती जा रही हैं। अक्सर शोक संतप्त परिजन आईबैंक को सूचित करना भूल जाते हैं जिससे कॉर्निया नष्ट हो जाता है और कई बार संग्रहकर्ता समय पर नहीं आते हैं।'

डॉ. हर्षवर्धन ने 'विजन एम्बेसडर' योजना शुरू करने के लिए प्रोजेक्ट विजन का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि यह नेत्र दान करने वाले और उसे प्राप्त करने वाले बीच समन्वय स्थापित करने की ओर एक महत्वपूर्ण प्रयास है। इससे नेत्र दान को सामाजिक आंदोलन के रुप खड़ा करने में मदद मिलेगी। कार्यक्रम स्वंयसेवकों के कार्य पर आधारित होगा जिन्हें 'विजन एम्बेसडर' कहा जाएगा। ये दान देने वाले और आईबैंक के बीच कड़ी का काम करेंगे जो फिलहाल नदारद है। प्रोजेक्ट विजन के तहत अभी तक 10,000 से भी ज्यादा व्यक्ति नेत्र दान कर चुके हैं और 1,000 लोगों को विजन एम्बेसडर बनाया गया है। गौरतलब है कि दुनियाभर में दृष्टिहीनता के सबसे ज्यादा मामले भारत में दर्ज किए जाते हैं। यहां दृष्टिहीनों की तादाद 3.5 लाख है और हर साल इसमें 30,000 का इजाफा हो रहा है। हर साल यहां केवल 35,000 कोर्निया ही इकट्ठा हो पाते हैं, जबकि कोर्नियल दृष्टिहीनता से निपटने के लिए हर साल 150,000 कोर्निया का जरूरत है।

स्रोत: IANS Hindi

चित्र स्रोत: Getty images


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