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Written By: Mousumi Dutta | Published : September 3, 2014 6:12 PM IST

आधुनिक युग की आम बीमारियों में मोटापा एक बीमारी है जो बड़ों से लेकर बच्चों तक को होता है। वैसे तो मोटे बच्चे बचपन में देखने में अच्छे लगते हैं, मगर स्वस्थ होना और मोटा होना दोनों में बहुत अंतर होता है। मोटापा एक रोग है जो धीरे-धीरे अनेक बीमारियों का कारण बन जाता है। बचपन में तो मोटापा सबको अच्छा लगता है मगर वह बच्चा स्वस्थ है कि नहीं इसका निर्धारण करना मुश्किल हो जाता है । बॉडी मास इंडेक्स के द्वारा आप बच्चे के ऊंचाई और वज़न का माप ले सकते हैं। इसके द्वारा अनुमान लगा सकते हैं कि आपका बच्चा मोटा है कि नहीं।
बच्चों में ऊर्जा लेने की मात्रा जब ऊर्जा देने की मात्रा से ज़्यादा होती है तब वह मोटापा का कारण बन जाता है। कभी-कभी आनुवांशिकता के द्वारा भी यह सौगात में मिलता है जो आपके हाथ में नहीं होता है। लेकिन इन सबको नियंत्रण में लाया जा सकता है, अगर माता पिता दोनों इस बात पर ध्यान दें। माता-पिता का यह कर्तव्य होता है कि उनको सक्रिय रखें, व्यायाम करवाए, बाहर खेलने के लिए भेजें। ऐसे खेल का चुनाव करें जिससे बच्चे की ऊर्जा का खपत हो, जैसे फुटबॉल, टेनिस, हॉकी आदि।
मोटापा के कारण बच्चों में बहुत सारी स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के अलावा मनोवैज्ञानिक समस्याएं भी उत्पन्न होने लगती है। मोटापे का रोग दो साल के बच्चे से शुरू हो सकती है। मोटे बच्चे जब धीरे-धीरे बड़े होने लगते हैं तब वे दूसरे बच्चों के बीच मजाक बन जाने के कारण खुद में शर्म महसूस करने लगते हैं। जिसके कारण वे बाहर निकलना नहीं चाहते हैं, घर के अंदर रहना चाहते हैं, खुद में ही घुटने लगते हैं, इन सब बातों का ध्यान अभिभावक को रखना चाहिए। अगर यह स्थिति और भी खराब हो जाए तो बच्चा अवसाद (डिप्रेशन) के अवस्था में पहुँच जाते हैं।
इन सबके अलावा मोटापा के कारण बड़ों की तरह कुछ बीमारियाँ बच्चों में भी हो सकती है:
इन सब बीमारियों के अपने चरम रूप को धारण करने के पहले ही अभिभावकों को बच्चे के मोटापा का इलाज करना चाहिए। लेकिन यह काम धैर्यपूवर्क करना पड़ता है। बच्चे को इस बात का एहसास दिलाना पड़ता है कि वह मोटा होने के बावजुद उनके लिए सबसे प्यारे हैं। इसलिए वे जो कुछ भी उसके लिए कर रहे हैं उसके अच्छे के लिए ही कर रहे हैं। बच्चों को स्वस्थ जीवनशैली की शिक्षा देने के लिए माता-पिता को भी स्वस्थ जीवनशैली की आदत डालनी पड़ेगी।
स्वस्थ और पौष्टिक जीवनशैली की शुरूआत शिशु अवस्था से ही शुरू हो जाती है। पहले तो बच्चे को माँ का दूध ज़रूर पिलाना चाहिए। फिर छह महीने से ठोस खाना देना शुरू कर देना चाहिए। पौष्टिकारक खाना खाने की आदत बचपन से ही करना चाहिए लेकिन खाने की आदत में कभी-कभी बदलाव भी ज़रूरी होता है। दो साल के बाद दूध से बनी चीजों की मात्रा थोड़ी कम कर देनी चाहिए, लेकिन बच्चे को रोज दूध ज़रूर पिलाना चाहिए। बच्चों के आहार में हरी सब्ज़ियाँ, रंगीन सब्ज़ियाँ, सभी तरह के फल, सेरल, अनाज, मांस आदि सब कुछ संतुलित मात्रा में देना चाहिए, ताकि उन्हें विटामिन, प्रोटीन, मिनरल, एंटीऑक्सीडेंट, आदि सब कुछ मिल सके। खाने में थोड़ी मात्रा में तेल, मार्जरिन, मक्खन का इस्तेमाल करें। प्रोसेस्ड फूड के जगह पर फल और सब्ज़ियाँ खाने की आदत डालें। लेकिन इन सबके अलावा हफ़्ते में एक बार केक, चिप्स, प्रोसेस्ड फूड भी खाने दें, इससे उन खाद्द पदार्थों को खाने की लालसा बच्चे में नहीं जागेगी। जब उन्हें प्यास लगे तब पीने के लिए पानी या जूस दें, कार्बोनेटेड ड्रिंक या सॉफ्ट ड्रिंक न दें।
बच्चों में हेल्दी खाने की आदत डालने के लिए माता-पिता को भी हेल्दी खाना खाना चाहिए क्योंकि बच्चों के लिए रोल मॉडल आप ही होते हैं। बाहर खाने के जगह घर पर ही खाना बनायें। बच्चे बाहर जाकर खाना पसंद करते हैं लेकिन उनके इस आदत को बदलने के लिए घर पर ही उनके पसंद का खाना बनायें, वे जब आपको खाते देखेंगे तो अपने खाने की आदत को धीरे-धीरे बदलने लगेंगे। उन्हें ही सलाद वैगरह बनाने के लिए दें, इससे खाने की इच्छा होगी। उनके खाने के प्रति रूची को बढ़ाने के लिए सलाद वैगरह बनाने में भी उनकी सहायता लें। इस तरह आपके प्रयास से बच्चे धीरे-धीरे अपनी आदत को बदलने लगेंगे।
एक स्वस्थ परिवार ही एक स्वस्थ बच्चे का पालन कर सकता है इसलिए पहले खुद को स्वस्थ जीवनशैली में ढालें फिर बच्चे को स्वस्थ बनायें।
चित्र स्रोत: Getty Images
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