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डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह इंसा को दो साध्वियों के साथ बलात्कार का दोषी पाए जाने के बाद 20 साल की जेल की सजा सुनाई गई है। स्वयंभू गॉडमैन (godman) और धर्मगुरू गुरमित सिंह राम रहीम ने कई सालों तक भक्तों की सेवा का आनंद लिया (जिनमें से कईयों को नसबंदी कराने के लिए भी राजी कर लिया गया), उनका शोषण किया, अपने राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल किया और यहां तक कि कुछ बुरी फ़िल्में भी बनायी जिनका हर तरफ मज़ाक उड़ाया गया और इन बेहुदा फ़िल्मों पर लाखों-करोड़ों चुटकुले भी बने। साल 2002 में डेरा परिसर में आध्यात्मिकता के नाम पर होने वाले यौन शोषण और बलात्कार की संस्कृति का खुलासा करते हुए एक डेरा संन्यासी ने तत्कालीन प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को एक पत्र लिखा। इस पत्र में राम रहीम पर आरोप लगाया गया कि वह डेरा की महिलाओं के साथ बंदूक की नोक पर बलात्कार करता है। इसी वर्ष, राम रहीम पर पत्रकार राम चंदर छत्रपति की हत्या का आरोप भी लगाया गया था जो डेरा सच्चा सौदा के भीतर होने वाले अपराधों को लगातार उजागर कर रहे थे।
हालांकि, भारत में ऐसे धर्मगुरुओं का ठिकाना रहा है, जो खुद को देवता और आध्यात्मिक गुरु बताते हैं, राम रहीम सिंह भी ऐसा ही एक स्वघोषित धर्मगुरु है। हमारे देश के आध्यात्मिक गुरुओं को तप और संयम के लिए जाना जाता है लेकिन राम रहीम सिंह की शान-ओ-शौकत और तपस्या की स्पष्ट कमी की वजह से लोगों को इस व्यक्ति पर संदेह होने लगा। लोगों को इस बात पर भी भरोसा नहीं हो रहा था कि आखिर कैसे केवल एक व्यक्ति को अपना गुरु मानने की वजह से कई पुरुष नपुंसक बनने के लिए तैयार हो जाएगा। या फिर आखिर इस गुरु ने ऐसा क्या कर दिया कि पागल भक्तों ने हरियाणा और पंजाब में उत्पात मचा दिया और कर्फ्यू लगाने की नौबत आ गयी? आखिर खुद को भगवान का शांतिदूत बताने वाले राममहिम के श्रद्धालु उसकी भक्ति में इतना कैसे डूब गए कि उन लोगों ने अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करना बंद कर दिया? किसी चीज़ में कोई तर्क को पीछे छोड़ देते हैं? हिंदुजा नेशनल हॉस्पिटल में मनोचिकित्सक और सलाहकार डॉ. करसी चावडा का मानना है कि यह कई चीजों का एक संयोजन है। डॉ. चावडा का कहना है कि, "सामान्य लोगों की संवेदनशीलता और ऐसे देवताओं के करिश्माई करतब, इस तरह की प्रथाओं को विकसित करने के लिए एकदम सही संयोजन बनाते हैं।" साथ ही डॉ. चावडा कुछ ने और कारण भी बताए, जो इस प्रकार हैं-
भारत में अध्यात्म के प्रति एक झुकाव है
डॉ. चावडा का कहना है कि आध्यात्मिक गुरुओं के प्रभाव में आना एक प्रकार की सशर्त अधिगम है। जहां पश्चिमी दार्शनिक गतिविधियां बुद्धि और भौतिक चीज़ों पर ध्यान केंद्रित करते हैं, वहीं भारतीय दर्शन हमेशा आध्यात्मिक, अंतर आत्मा को समझने की कोशिश करता है। भारतीय मानस में गुरु-शिष्य परंपरा का अधिक गहरा प्रभाव देखा जाता है। इसलिए, हम सहनशील भारतीयों का हमेशा एक आध्यात्मिक और ज्ञानी व्यक्ति की ओर झुकाव होता है, जो सही राह दिखा सके।
दैनिक जीवन मुश्किल है
औसत भारतीय व्यक्ति का जीवन कठिन है। उन्हें सामाजिक प्रतिबंध, पैसे से जुड़ी समस्याएं, पारिवारिक झगड़े और अवसरों की कमी जैसी बहुत सारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। यह कोई आश्चर्य नहीं है कि खुशी के सूचकांक पर हमारे देश बहुत कम स्थान पर है। अगर डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट मानें तो करीब 5 करोड़ भारतीय उदास हैं। "हम हमेशा हमारी समस्याओं के जवाब तलाशते रहते हैं। हम अपनी समस्याओं से हमें परिवहन के लिए कुछ करना चाहते हैं और अंत में, हमारी स्थिति पर कुछ नियंत्रण है, "डॉ. चावदा कहते हैं। यह मानसिकता हमें उन गवाहों के प्रति अधिक ग्रहण करता है जो हमें सही राह दिखाने का दावा करते हैं।
बाबा और तांत्रिक करिश्माई होते हैं
"अगर एक बाबा पूर्ण रुप से मूर्ख होते, तो आम लोग उसे इस तरह का आदर और भक्ति नहीं करते। जाहिर है, इन बाबाओं के व्यक्ति से किसी न किसी प्रकार का करिश्मा जुड़ा हुआ होता है, जिसके कारण लोग उनकी तरफ आकर्षित होते हैं।" डॉ. चावडा ने समझाते हुए बताया,"हालांकि, बाबा राम रहीम ने अपने करिश्मे का इस्तेमाल कुछ सकारात्मक कार्य करने की बजाय, ठीक उसका उल्टा किया। ऐसा भी हो सकता है कि, राम रहीम ने किसी के भले की नीयत से यह कार्य शुरु किया होगा, लेकिन बाद में सत्ता का नशे उसके सिर चढ़ गया होगा। और यह बात तो सभी जानते हैं कि, शक्ति लोगों को भ्रष्ट बना सकती है।"
आमतौर पर बाबाओं में एक आकर्षक होता है जो केवल उनके ऊपरी शानो-शौकत तक ही सीमित नहीं है। डॉ. चावडा के अनुसार, "हालांकि, अच्छा दिखना हमेशा काम आता है। ऊपर से इसमें थोड़ी सी वाकपटुता,लोगों को धोखा देने और उन्हें बहलाने-फुसलाने वाले गुण जोड़ दिए जाएं, थोड़ी तरकीबें लगाई जाएं तो बाबा बन जाने की तैयारी पूरी हो जाती है। सत्य साईंबाबा अपने भक्तों के लिए हवा में गहने और विभूति प्राप्त पाने के लिए प्रसिद्ध थे। लेकि अज़ीब बात यह है, कि महंगे तोहफे केवल वीआईपी या प्रतिष्ठित लोगों के लिए और विभूति ग़रीब भक्तों को दिए जाते थे।"
भारत में लोग अनेकवादी होते हैं
अधिकांश भारतीय हिंदू धर्म को मानते हैं, जिनके सिद्धांत अनेकवाद की अनुमति देते हैं या कई धार्मिक मान्यताओं के अनुकूल माहौल बनाता है। डॉ.चावडा का कहना है कि भारतीय दर्शन की वजह से देश में बाबाओं की संस्कृति को बढ़ावा देने की संभावना उत्पन्न होती है।
राजनीतिक समर्थन
राजनीतिज्ञों और आध्यात्मिक गुरुओं के रिश्ते हमेशा से प्रगाढ़ रहे हैं। डॉ. चावड़ा कहते हैं कि, "राजनेताओं ने इस तरह के रिश्तों का अच्छा और ग़लत उपयोग किया है। राजनीतिक दलों के समर्थन के बिना बाबाओं-गुरुओं को इतनी ताकत नहीं मिल सकती।" ज्योतिषी और अध्यात्मिक गुरु चंद्रस्वामी ने पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव जैसे राजनेताओं के निकट सहयोग में काम किया। गुरमीत सिंह के डेरा सच्चा सौदा ने खुलेआम कांग्रेस पार्टी के प्रति अपना समर्थन व्यक्त करते हुए पंजाब में अपने भक्तों को कांग्रेस को जिताने का आदेश दिया। जब एक आध्यात्मिक गुरु का अपने भक्तों पर बहुत अधिक प्रभाव होता है, तो यह स्वाभाविक है कि राजनीतिक दल उनका साथ प्राप्त करने की कोशिश की है।
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अनुवादक-Sadhana Tiwari
चित्रस्रोत-YouTube/Hakikat Entertainment Pvt Ltd