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लेप्रसी के मरीज़ों की सेवा करते थे बाबा आमटे, गूगल ने डूडल बनाकर किया याद

1988 में मानव अधिकारों के क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्र पुरस्कार से और 1999 में गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

लेप्रसी के मरीज़ों की सेवा करते थे बाबा आमटे, गूगल ने डूडल बनाकर किया याद
बाबा आमटे ने जरूरतमंद लोगों की सेवा खासकर कुष्ठ रोगियों की सेवा करने के लिए समर्पित किया। @file photo

Written by Editorial Team |Updated : December 26, 2018 3:38 PM IST

कुष्ठरोग (कोढ़) या लेप्रसी एक प्रकार का त्वचा का इन्फेक्शन है जो शरीर के अन्य हिस्सों को  भी को प्रभावित करता है। इसका प्रभाव आंखों विशेषकर भौंहो के आसपास की त्वचा पर भी देखा जा सकता है। कोढ़ की समस्या से पीड़ित लोग अक्सर शिकायत करते हैं कि उन्हें शरीर में कोई संवेदना महसूस नहीं होती और उनके बाल विशेषकर भौंहों के बाल गिरने लगते हैं।  इन मरीज़ों को समाज में बहुत ही नफरत की नज़र से देखा जाता रहा है। इन्हीं कुष्ठरोगियों की सेवा करने  बाबा आमटे की आज जयंती है।

इस मौके पर गूगल ने बुधवार को भारतीय समाजसेवी मुरलीधर देवीदास आमटे को उनकी 104वीं जयंती पर डूडल के जरिए याद किया। उन्हें बाबा आमटे के नाम से जाना जाता है। डूडल के स्लाइड शो में आमटे के जीवन की झलक दिखाई गई, जिसे उन्होंने जरूरतमंद लोगों की सेवा खासकर कुष्ठ रोगियों की सेवा करने के लिए समर्पित किया।

वृंदा जावेरी द्वारा निर्मित, डूडल भविष्य बाबा आमटे के चित्र के साथ शुरू होता है, जिसमें वह भविष्य की ओर देखते मालूम पड़ते हैं, इसके बाद उनकी एकता मार्च को दिखाया गया है।

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एक अन्य स्लाइड में उनके 'आनंदवन' को दिखाया गया है, जो कुष्ठ रोगियों के लिए उनके द्वारा स्थापित किया गया एक गांव और केंद्र था।

baba-amte doodle

26 दिसंबर 1914 को जन्मे आमटे को डूडल समर्पित करते हुए गूगल ने कहा, "हम मानवता के लिए जीवन भर सेवा करने वाले बाबा आमटे को सलाम करते हैं।"

महाराष्ट्र के एक संपन्न परिवार से ताल्लुक रखने वाले आमटे जंगली जानवरों का शिकार करने, खेल खेलने और लक्जरी कारें चलाने के शौकीन हुआ करते थे। उन्होंने कानून की पढ़ाई की और उम्र के दूसरे दशक में पहुंचने तक अपनी सफल कंपनी संचालित करना शुरू किया।  आमटे बचपन से समाज में मौजूद असमानताओं के बारे में वाकिफ थे और उम्र के तीसरे दशक में उन्होंने वंचितों के साथ काम करने के लिए वकालत की प्रैक्टिस छोड़ दी।  इसी दौरान उनती मुलाकात इंदु गुले शास्त्री से हुई, एक बुजुर्ग नौकर के प्रति जिनकी दयालुता देखकर बाबा आमटे बेहद प्रभावित हुए और दोनों ने शादी कर ली।

ब्लॉगपोस्ट के मुताबिक, एक बार कुष्ठ रोग से पीड़ित एक शख्स को देखने के बाद आमटे ने पूरा जीवन इस बीमारी से ग्रस्त लोगों की सेवा करने में लगा दिया।  राष्ट्रीय एकता में दृढ़ विश्वास रखने वाले बाबा आमटे ने 1985 में 72 वर्ष की उम्र में 'निट इंडिया मार्च' शुरू किया और 3,000 मील से ज्यादा का सफर तय कर कन्याकुमारी से कश्मीर तक की यात्रा की।

उन्होंने तीन साल बाद दूसरा मार्च निकाला और 1,800 मील का सफर करते हुए असम से गुजरात तक की यात्रा की।

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आमटे के अथक परिश्रम के सम्मान में उन्हें 1971 में पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 1988 में मानव अधिकारों के क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्र पुरस्कार से और 1999 में गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

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