ग्लूकोमा हो सकती है ऑटोइम्यून बीमारी: रिसर्च

आंखों के टी सेल्‍स के माध्‍यम से किया जा सकता है ग्‍लूकोमा का उपचार।

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Written By: Yogita Yadav | Published : August 10, 2018 6:41 PM IST

दुनिया भर में 70 मिलियन लोग ग्लूकोमा से पीडि़त हैं। यह आंखों की बीमारी है, जिसके मरीजों की संख्‍या लगातार बढ़ रही है। परंतु इसके संदर्भ में एक नया चौंकाने वाला शोध आया है। शोधकर्ताओं को ऐसा लग रहा है कि यह एक ऑटोइम्‍यून बीमारी है1

यह है अध्‍ययन

चूहों पर हुए एक अध्ययन में  शोधकर्ताओं ने पाया किया ग्लूकोमा में दिखाई देने वाले प्रगतिशील रेटिना अपघटन के लिए शरीर की अपनी टी कोशिकाएं ही जिम्मेदार हैं। नेचर कम्युनिकेशंस जर्नल में प्रकाशित अध्ययन में कहा गया है कि, इन टी कोशिकाओं को रेटिना न्यूरॉन्स पर हमला करने के लिए प्राथमिकता दी जाती है, जो आमतौर पर हमारे शरीर में जीवाणुओं के साथ पिछले इंटरैक्शन के परिणामस्वरूप होते हैं।

नए विकल्‍प की खोज

मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) में जीवविज्ञान के प्रोफेसर एवं शोध के सह-लेखक जियानज़ु चेन ने कहा, "यह शोध ग्लूकोमा को रोकने और इलाज के लिए एक नया विकल्‍प प्रस्‍तुत कर रहा है।  दृष्टिकोण खुलता है।" ग्लूकोमा असल में आंख के विकारों का एक समूह है, जो ऑप्टिक तंत्रिका को नुकसान पहुंचाता है।

ये है वजह

ग्लूकोमा के लिए जिम्‍मेदार सबसे बड़े कारणों में से आंखों पर पड़ने वाला अतिरिक्‍त दबाव है। जो अकसर बढ़ती उम्र में होता है। यह आंखों में नमी बनाए रखने वाले तरल पदार्थ को रोककर आंखों को नुकसान पहुंचाता है। शुरूआत में लोगों को पता ही नहीं होता कि वे इस बीमारी से ग्रस्‍त हैं। जब तक उन्‍हें पता चलता है तब तक रेटिना की आधी क्षमता समाप्‍त हो चुकी होती है।

ऐसे हो सकता है उपचार

इस बीमारी के उपचार में अधिकांश में आंखों पर दबाव कम करने पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। जिसे इंट्राओकुलर दबाव भी कहते हैं। हालांकि, कई मरीजों में, इंट्राओकुलर दबाव सामान्य होने के बाद भी रोग ठीक नहीं हो पाता। अगर इस दबाव को प्रारंभिक स्‍तर पर ही कम किया जा सके तो इसका उपचार किया जा सकता है।

चित्र स्रोत : shutterstock.

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