पूर्व रक्षामंत्री जॉर्ज फर्नांडीज का 89 साल की उम्र में निधन, लंबे समय से अल्जाइमर से थे पीड़ित

जॉर्ज फर्नांडीज अल्जाइमर से पीडि़त थे। अल्जाइमर भूलने की बीमारी है। बीमारी जब अडवांस्ड स्थिति में पहुंच जाती है, तो मरीज अपने परिजनों और रिश्तेदारों को पहचनाना तक बंद कर देता है!

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Written By: Yogita Yadav | Updated : January 29, 2019 10:17 AM IST

भारत के पूर्व रक्षामंत्री जॉर्ज फर्नांडीज का 89 साल की उम्र में मंगलवार सुबह छह बजे निधन हो गया!  वह काफी लंबे समय से अल्जाइमर रोग से पीड़ित थे और वे अभी बिस्तर पर ही रहते थे। उन्होंने दिल्ली के एक अस्पताल में आखिरी सांस ली। फर्नांडीज का बेटा विदेश में रहता है, उनके वापस आने के बाद उनका संस्कार किया जाएगा। फर्नांडीस का जन्म 3 जून 1930 को मैंगलोर में हुआ था। वे अटल सरकार में अक्टूबर 2001 से मई 2004 तक रक्षामंत्री रहे। आखिरी बार वे अगस्त 2009 से जुलाई 2010 तक राज्यसभा के सांसद रहे थे। फर्नांडीज सबसे पहले साल 1967 में लोकसभा सांसद चुने गए थे। रक्षामंत्री के अलावा उन्होंने कम्यूनिकेश, इंडस्ट्री और रेलवे मंत्रालयों की भी कमान संभाली है।

पीएम मोदी ने उनके निधन पर दुख जताते हुए कहा, 'जॉर्ज साहब ने भारत के राजनीतिक नेतृत्व का सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधित्व किया। वे स्पष्टवादी और निडर, बेबाक और दूरदर्शी थे, उन्होंने हमारे देश के लिए अहम योगदान दिया है. वह गरीबों और हाशिए पर रहे लोगों के अधिकारों के लिए सबसे प्रभावी आवाज़ों में से एक थे। उनके निधन की खबर सुनकर दुख हुआ।

अल्‍जाइमर से थे पीडि़त 

जॉर्ज फर्नांडीज अल्‍जाइमर से पीडि़त थे। अल्जाइमर भूलने की बीमारी है। बीमारी जब अडवांस्ड स्थिति में पहुंच जाती है, तो मरीज अपने परिजनों और रिश्तेदारों को पहचनाना तक बंद कर देता है। देश में लगभग 16 लाख लोग इस बीमारी से पीड़ित हैं। भारत में लगभग 40 लाख लोग डीमेंशिया से पीड़ित हैं और इसमें अल्जाइमर के मामले सबसे ज्यादा हैं। तकरीबन 16 लाख मरीज अल्जाइमर से पीड़ित हैं।

डीमेंशिया से अलग है अल्‍जाइमर

अक्सर लोग समझते हैं कि ‘डीमेंशिया’ और ‘अल्जाइमर’ एक ही हैं। हालांकि ये दोनों स्थितियां एक नहीं हैं, वास्तव में अल्जाइमर डीमेंशिया का एक प्रकार है। डीमेंशिया में कई बीमारियां शामिल हैं, जैसे अल्जाइमर रोग, फ्रंट टू टेम्पोरल डीमेंशिया, वैस्कुलर डीमेंशिया आदि। डीमेंशिया के मरीजों में शुरुआत में याददाश्त कमजोर होने लगती है और मरीज को रोजमर्रा के काम करने में परेशानी होने लगती है। मरीज तारीखों, रास्तों और जरूरी कामों को भूलने लगता है। वह घर या ऑफिस में काम करते समय गलत फैसले लेने लगता है।

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