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बहुत खराब स्तर पर पहुंच गई है पर्यावरण की हालत, नहीं बचेंगे लोग

वायु प्रदूषण के चलते 25 लाख लोगों की हो चुकी है मौत।

Written By Editorial Team
Published : June 15, 2018 3:27 PM IST

स्वच्छ भारत अभियान, डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया, सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) को 10 फीसदी तक ले जाने जैसी केंद्रीय योजनाओं को धता बताते हुए पर्यावरणविद् जयधर गुप्ता ने कहा कि आधे से ज्यादा राज्यों को इसकी बुनियादी चीजों के बारे में ही नहीं पता है और इन सब योजनाओं का देश के लोगों को क्या फायदा, जब वह इसका लाभ उठाने के लिए बचेंगे ही नहीं।

कंपनियों के साथ भारत आया प्रदूषण

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'माई राइट टू ब्रीथ' के संस्थापक सदस्य और पर्यावरणविद् जयधर गुप्ता ने एक साक्षात्कार में कहा, "पर्यावरण की हालत बहुत खराब स्तर पर पहुंच गई है। जब लोग इस खतरनाक माहौल में बचेंगे ही नहीं, तो जनहित में तैयार की गई तमाम योजनाओं का क्या फायदा। चार साल पहले चीन ने अपने यहां पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले सभी कारखानों, कंपनियों को देश से बाहर भारत, इंडोनेशिया, मलेशिया जैसे विकासशील देशों में ले जाने का आदेश दिया और इन पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगा दिया। वही कंपनियां भारत के मेक इन इंडिया अभियान के तहत भारत आई और यहां जमकर प्रदूषण फैला रही हैं।" जयधर गुप्ता ने कहा, "इसका सबसे बड़ा कारण भारत जैसे विकासशील देशों में इन कंपनियों, कारखानों के लिए नियम सही तरीके से लागू नहीं होना है। कंपनियां यहां आकर करोड़ों रुपये का व्यापार करती हैं, प्रदूषण फैलाती हैं और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती हैं और मात्र दो से चार लाख रुपये अधिकारियों को रिश्वत देकर बच निकलती हैं।"

 25 लाख लोगों की हुई मौत

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प्रदूषण और स्वास्थ्य पर लांसेट आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में वायु प्रदूषण से सबसे अधिक मौतें होती हैं। देश में वर्ष 2015 में 25 लाख लोगों को वायु प्रदूषण से अपनी जान गंवानी पड़ी। वहीं चीन इस मामले में दूसरे नंबर पर रहा, जहां 18 लाख लोग वायु प्रदूषण की भेंट चढ़ गए। आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, 2015 में दुनिया भर में अनुमानित 90 लाख लोग प्रदूषण का शिकार हुए, जिसमें भारत की 28 प्रतिशत हिस्सेदारी रही।

21 फीसदी प्रदूषण ऑटोमोबाइल जगत से

वायु प्रदूषण के स्तर में वृद्धि के कारणों के बारे में बताते हुए जयधर गुप्ता ने बताया, "आईआईटी कानपुर हर साल कहां कितना प्रदूषण हो रहा है, कैसे हो रहा इसकी जांच करने के लिए प्रदूषण जांच कार्यक्रम चलाती है। इसमें खुलासा हुआ है कि सबसे ज्यादा प्रदूषण 21 फीसदी ऑटोमोबाइल जगत से हो रहा है, विशेषकर दुपहिया और ट्रक जैसे वाहनों से। दुपहिया वाहनों में लगे इंजन इतनी खराब गुणवत्ता के हैं कि अन्‍य देशों में इनकी अनुमति नहीं। जबकि भारत में आम जनता दो से चार हजार रुपये बचाने के चक्कर में खराब गुणवत्ता के इंजन वाले दुपहिया वाहनों को खरीदती है।

खराब ईंधन है डीजल

जयधर गुप्ता ने कहा, "ट्रकों में प्रयोग होना वाला डीजल खराब ईंधन है। विकसित देशों में डीजल का प्रयोग कम किया जाता है। डीजल पेट्रोल के मुकाबले 60 से 70 फीसदी प्रदूषण फैलाता है। विकसित देशों में डीजल पेट्रोल से सात से नौ गुणा तक महंगा होता है। जबकि भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा विकासशील देश होगा, जहां डीजल पेट्रोल से सस्ता है। क्‍योंकि यहां डीजल पर सब्सिडी दी हुई है। वायु प्रदूषण के पीछे एक और बड़ा कारण पड़ोसी राज्य पंजाब और हरियाणा के किसानों द्वारा पराली जलाना भी है। इसके समाधान के लिए सरकार को चाहिए कि वह पराली जलाने की इस व्यवस्था को तटवर्ती इलाकों में कराए ताकि वह धुआं समुद्री हवा के सहारे बाहर निकले।"

इमारतों में कैद हो रहे हैं लोग

पर्यावरणविद् गुप्ता ने कहा, "लोगों ने पांच-पांच मंजिला मकान बनाकर खुद को उसमें कैद कर लिया है। अगर लोग ऐसे ही दीवारें ऊंची करके कैद होते जाएंगे तो उन्हें साफ हवा मिलना दूभर हो जाएगा। हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) ने वर्ष 2016 में दुनिया के सबसे प्रदूषित 15 शहरों की सूची जारी की है, जिसमें भारत के 14 शहर शामिल हैं। संगठन ने विश्व के 859 शहरों की वायु गुणवत्ता के आंकड़ों का विश्लेषण किया था। आपको जानकर हैरत होगी कि इन 14 शहरों में एक नाम श्रीनगर का भी है। देखिए जब घाटी का यह हाल है यह तो बाकी देश का क्या होगा।"

ढूंढना होगा समाधान

उन्होंने बताया, "इन्हीं सब कारणों की वजह से हमने एक 'नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम' बनाया था, जिसके मसौदा हमने कुछ महीनों पहले केंद्र सरकार को भेजा था, लेकिन सरकार ने उसपर ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई और उसमें बिना हमारे प्रावधानों को सुने तीन महीने पहले एक व्यर्थ सा कार्यक्रम लागू कर दिया, लेकिन हमने हार नहीं मानी और उसका विरोध किया, जिसके बाद केंद्र सरकार ने इसी महीने वायु प्रदूषण पर एक प्रभावी कार्यक्रम लागू करने का वादा किया है।"

स्रोत:IANS Hindi.

चित्रस्रोत:Shutterstock.

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