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Written By: Editorial Team | Published : June 15, 2018 10:32 AM IST
© Shutterstock
कॉलेज छात्राओं में बढ़ते तनाव के स्तर और दूसरी मनोवैज्ञानिक समस्याओं को देखते हुए दिल्ली यूनिवर्सिटी के गर्ल्स कॉलेज जानकी देवी मेमोरियल कॉलेज (जेडीएमसी) में छात्राओं की मानसिक सेहत को जांचने के लिए इमोशनल काउंसलिंग शुरू की गई। जेडीएमसी परिसर में परीक्षा के दौरान होने वाले तनाव पर दो घंटे का एक इंटरएक्टिव सेशन आयोजित किया गया, जिसमें कॉलेज की लगभग 60-70 छात्राओं ने भाग लिया।
सेशन के दौरान छात्रों को तनाव होने के कारणों के संबंध में एक प्रश्नावली दी गई, जिसे उन्हें भरना था। यह कवायद आर्ट्स, कॉमर्स और साइंस स्ट्रीम के स्टूडेंट्स को एग्जाम के दौरान होने वाले तनाव के स्तर और छात्रों को होने वाली बेचैनी के कारणों को समझने के लिए की गई थी।
सर्वे के अंत में तनाव के कुछ कारण उभरकर सामने आए, जिसमें परीक्षाओं की तैयारी पूरी न होना, समय की कमी, आत्मविश्वास कम होना, दोस्तों का दबाव, पैरंट्स व समाज के लोगों का दबाव और भविष्य में करियर के चुनाव में भ्रम की स्थिति रहना और स्पष्टता न होना शामिल हैं।
जेडीएमसी की प्रिंसिपल डॉ. स्वाति पाल ने कहा, "हम अपने कॉलेज में इमोशनल काउंसलिंग इसलिए शुरू कर रहे हैं, क्योंकि यह साबित हो चुका है कि महिलाएं या लड़कियां किसी मुद्दे पर बहुत जल्दी भावुक हो जाती हैं और भावनाओं में बहकर अपनी जिंदगी के तमाम फैसले करती हैं।"
उन्होंने कहा, "जोखिम के कारणों को पहचानने में नाकाम रहने और रिस्क फैक्टर को दूर करने के लिए समय से कोई कार्वाई न करना से युवाओं में प्रमुख मनोवौज्ञानिक समस्याएं और चुनौतियां उभरती हैं, जो उन्हें काफी परेशान कर सकती हैं। इसलिए हमारे जैसी शिक्षण संस्थाओं को छात्रों के व्यक्तित्व को उभारने में प्रभावी दखल देकर सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए और उन्हें कॉलेज कैंपस में सौहार्दपूर्ण और बेहतर माहौल मुहैया कराना चाहिए।"
काउंसलिंग सेशन में भाग लेने वाली एक छात्रा नेहा ने बताया, "यह काफी उपयोगी सेशन था। इस सेशन में शामिल होने से न सिर्फ हमको यह पता चला कि हमको टेंशन किस कारण से हो रही है। सेशन में हमें तनाव को दूर भगाने के कुछ टिप्स भी दिए गए।"
सर्वे कराने वाली संस्था जायगो के संस्थापक अरिंदम सेन ने कहा, "आंकड़ों से यह पता चलता है कि भारत में 15 से 29 वर्ष के आयुवर्ग के युवाओं में आत्महत्या की दर काफी ऊंची है। हालांकि, युवक कई कारणों से आत्महत्या जैसा घातक कदम उठाते हैं, लेकिन एग्जाम में फेल होना, बेरोजगारी और डिप्रेशन आत्महत्या के कुछ कारणों से एक है।"
उन्होंने कहा, "एग्जाम में बच्चों पर पढ़ाई और अच्छे नंबर लाने का दबाव बनाने की जगह पेरेंट्स को उदार रहना चाहिए। किसी परीक्षा में किसी छात्र की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह अपने पास उपलब्ध संसाधनों का किस तरह से इस्तेमाल करता है, अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए क्या कदम उठाता है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पेरेंट्स को यह देखना चाहिए कि बच्चों की दिलचस्पी और झुकाव कहां हैं।"
उन्होंने कहा, "हर पैरंट्स को अपने बच्चे की ताकत को पहचानना चाहिए और उन्हें अपने करियर का चुनाव खुद करने देना चाहिए। अगर जरूरी हो तो छात्र या छात्रा अपने पेरेंट्स के साथ किसी मनोवैज्ञानिक से अपॉइंटमेंट लेकर उनसे मिलने जा सकते हैं। इससे पेरेंट्स को यह पता लगेगा कि छात्रों के दिमाग से परीक्षा के डर को कैसे भगाया जा सकता है और बच्चों पर अपनी उम्मीदों को पूरा करने का बोझ किस हद तक डालना चाहिए।"
स्रोत:IANS Hindi.
चित्रस्रोत:Shutterstock.