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शुरुआत में बहरेपन की पहचान से उपचार होगा आसान, एक्सपर्ट से जानें बचने के आसान उपाय

शुरुआत में हो बहरेपन की पहचान तो उपचार आसान : विशेषज्ञ

देश में हर साल 27 हजार से ज्यादा बच्चे बहरे पैदा होते हैं, जिसके पीछे चिकित्सा सेवाओं का अभाव है। एक्सपर्ट की मानें तो शुरुआत में उपचार से लाभ होता है।

Written by Editorial Team |Updated : March 2, 2021 4:29 PM IST

विश्व श्रवण दिवस (World Hearing Day 2021) के मौके पर देश के अलग राज्यों में जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं। 3  मार्च को दुनिया भर में इस दिन सुनने संबंधी समस्याओं के प्रति जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं। एक्सपर्ट की मानें तो दुनियाभर में लगभग 36 करोड़ लोग सुन नहीं सकते। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 50 लाख से ज्यादा आबादी बहरेपन की समस्या से पीड़ित है। विश्व की करीब 5 फीसदी आबादी सुनने से लाचार है। इसी के मद्देनजर सर गंगा राम अस्पताल में भी हर साल की तरह कान, नाक और गला (ईएनटी) विभाग के चिकित्सकों द्वारा बहरेपन से निजात पाने के लिए जन-जागरूकता की आवश्यकता पर जोर दिया जाता है।

साल में 27 हजार से ज्यादा बच्चे पैदा होते हैं बहरे

गंगाराम अस्पताल के कॉक्लीयर इंप्लांट कंसल्टेंट डॉ. शलभ शर्मा ने बताया कि देश में हर साल पैदा होने वाले 27,000 से अधिक शिशुओं में बहरेपन की शिकायत रहती है, जिससे उनका विकास अवरुद्ध हो जाता है। लेकिन इनकी पहचान अगर आरंभ में हो जाए तो इलाज आसान हो जाता है। उन्होंने बताया कि युनिवर्सल न्यूबोर्न हियरिंग स्क्रीनिंग (यूएनएसएस) से नवजात शिशुओं में श्रवण शक्ति की पहचान आसानी से की जा सकती है। बस इसके लिए माता-पिता को जागरूक करने की जरूरत है।

क्या है माता-पिता के लिए जरूरी

अस्पताल के ईएनटी विभाग के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. ए.के. लाहिड़ी ने कहा, " माता-पिता व परिजनों को किसी श्रवण शक्ति कम होने से संबंधित तकलीफों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। कोक्लियर इंप्लांट एक व्यक्ति को खामोशी से आवाज की दुनिया में ले जाता है। यह जीवन को बदलने वाला क्षण है। कई विकसित देशों में हर नवजात शिशु के लिए हियरिंग स्क्रीनिंग कराई जाती है। भारत को भी यूनिवर्सल न्यू बॉर्न हियरिंग स्क्रीनिंग को अनिवार्य बनाने पर विचार करना चाहिए।"

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क्या कहते हैं एक्सपर्ट

डॉ. शलभ शर्मा ने कहा, " देश में सुनने से लाचार नौजवानों की बड़ी आबादी है जिससे उनकी शारीरिक और आर्थिक सेहत पर भी असर पड़ता है।"

डॉ. आशा अग्रवाल ने कहा कि समय से रोग की पहचान और बहरेपन का इलाज जरूरी है। अपने जीवन के प्रारंभिक चरण में मिली उचित सहायता से बच्चा अपनी कमी से उबरकर तेजी से बोलना और बातचीत करना सीख सकता है। इससे उसे समाज की मुख्य धारा का अंग बनने का भी मौका मिलता है।

स्रोत- IANS Hindi.

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