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Written By: Editorial Team | Updated : September 16, 2018 9:04 AM IST
सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार को भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के तहत दहेज उत्पीड़न की शिकायतों पर पुलिस द्वारा कार्रवाई करने के अधिकार को बहाल कर दिया। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए.एम.खानविलकर व न्यायमूर्ति डी.वाई.चंद्रचूड़ की पीठ ने अपने पहले के फैसले को पलट दिया और पुलिस को पहले की तरह कार्रवाई करने की व्यवस्था दे दी।
इससे पहले के अपने फैसले में अदालत ने कहा था कि परिवार कल्याण समितियां दहेज उत्पीड़न की शिकायतों की जांच करेंगी और अपनी रिपोर्ट पुलिस के पास जमा करेंगी और पुलिस उस पर कार्रवाई करेगी।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि परिवार कल्याण समितियों की स्थापना और उन्हें अधिकार देना 'अनुचित' है।
प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने कहा, "इस क्षेत्र में संवैधानिक प्रावधान व निर्णय हैं और इसलिए समिति के गठन से जुड़े निर्देश और उस समिति को अधिकार देना गलत है।"
अदालत ने पुलिस के अधिकार को बहाल करते हुए कहा कि पुलिस इन मामलों में सावधानी के साथ कार्य करेगी।
अदालत ने कहा, "हमारा मानना है कि जांचकर्ता अधिकारी को दहेज उत्पीड़न की शिकायतों पर कार्रवाई करते समय सावधानी बरतने का निर्देश देना उचित है।"
अपने पहले के फैसले का जिक्र करते हुए अदालत ने कहा कि दहेज उत्पीड़न के जिन मामलों में सात साल या उससे कम की गिरफ्तारी की सजा हो सकती है, उसमें जांच अधिकारी व्यक्ति द्वारा किए गए अपराध के आधार पर गिरफ्तारी का निर्णय ले सकते हैं।
अधिकारी को इस बात से संतुष्ट होना होगा कि इस तरह के लोगों को और अपराध करने से रोकने के लिए गिरफ्तारी आवश्यक है। इन अपराधों गायब हो जाना या साक्ष्यों से छेड़छाड़ या आगे की जांच की जरूरत शामिल हैं।
अदालत ने अपने 27 जुलाई, 2017 के आदेश में कहा था कि जिला विधि सेवा अधिकारी, परिवार कल्याण समितियां गठित की जाएंगी।
अदालत ने कहा कि राज्य पुलिस महानिदेशक धारा 498ए के तहत अपराधों की जांच कर रहे जांच अधिकारियों को शीर्ष अदालत द्वारा पहले दिए इस तरह के मामले में फैसले के बारे में शीर्ष अदालत के फैसले के बारे में प्रशिक्षित करेंगे।