10 से 15 फीसदी आबादी संक्रमित होने पर कोरोना वायरस खो बैठेगा अपनी ताकत : रिसर्च में खुलासा

वैज्ञानिकों के मुताबिक, हर्ड इम्युनिटी में कोरोनावायरस महामारी पर कंट्रोल करने के लिए कम से कम 60 से 70 फीसदी आबादी का संक्रमित होना जरूरी है। लेकिन अब वैज्ञानिकों ने एक नया अध्ययन किया है। इस अध्ययन के मुताबिक, 10 से 15 फीसदी आबादी का संक्रमित होना भी वायरस पर (Coronavirus to End Soon) नियंत्रण के लिए काफी हद तक कारगर हो सकता है।

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Written By: Kishori Mishra | Updated : July 14, 2020 6:29 PM IST

Coronavirus to End Soon : दुनियाभर में कोरोनावायरस का संक्रमण दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है, जो विश्वभर के वैज्ञानिकों और लोगों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। रोजाना लाखों की संख्या में मौत के आंकड़े बढ़ते जा रहे हैं। पिछले कुछ दिन पहले एक रिसर्च हुआ था, इस रिसर्च के मुताबिक, कोरोनावायरस का स्ट्रेन कमजोर हो रहा है और वैक्सीन तैयार करने के लिए यह एक बहुत ही अच्छा समय है। दुनियाभर में कोरोनावायरस के संक्रमण पर नियंत्रण के लिए कई तरह के (Coronavirus to End Soon) उपाय अपनाए जा रहे हैं। अबतक अलग-अलग तरह के प्रयोग और रिसर्च किए जा चुके हैं।

मार्च में कोरोनावायरस से नियंत्रण के लिए हर्ड इम्युनिटी की चर्चा हो रही थी, लेकिन उस समय बहुत से वैज्ञानिकों ने इसकी सफलता पर अशंका व्यक्त की। वैज्ञानिकों के मुताबिक, हर्ड इम्युनिटी में कोरोनावायरस महामारी पर कंट्रोल करने के लिए कम से कम 60 से 70 फीसदी आबादी का संक्रमित होना जरूरी है। लेकिन अब वैज्ञानिकों ने एक नया अध्ययन किया है। इस अध्ययन के मुताबिक, 10 से 15 फीसदी आबादी का संक्रमित होना भी वायरस पर (Coronavirus to End Soon) नियंत्रण के लिए काफी हद तक कारगर हो सकता है।

यह अध्ययन ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और वर्जीनिया टेक यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों द्वारा की गई है। अध्ययन में पाया है कि अगर 10 से 15 फीसदी आबादी भी कोरोनावायरस से संक्रमित हो गई, तो यह वायरस अपनी ताकत खो सकता है, लेकिन जानना यह है कि क्या सच में कोरोनावायरस वायरस पहले की अपेक्षा कमजोर हो रहा है?

अध्ययनकर्ताओं ने स्वीडन का दिया उदाहरण

शोधकर्ताओं ने अपने इस अध्ययन में स्वीडन का उदाहरण दिया है। कोरोनावायरस पर लगाम कसने के लिए जहां दुनियाभर के देश लॉकडाउन कर रहे हैं और पाबंदियां लागू कर रहे हैं। वहीं, स्वडीन ने ना तो अपने देश में लॉकडाउन लागू किया और ना ही कोई सख्त पाबंदियां लागू कीं। स्वीडन में आम दिनों की तरह ही दुकानें, रेस्त्रां, बाजार और बार खुले रहे। इसके परिणाम यह हुआ कि कोरोनावायरस का संक्रमण स्वीडन में काफी तेजी से फैला। यहां शुरुआती समय में मौत के आंकड़े काफी ज्यादा हुए। हालांकि, बाद में मौतों की संख्या धीरे-धीरे घटने लगी।

अध्ययनकर्ताओं का कहना है कि स्वीडन में इस समय रोजाना सिर्फ 100 मामले आ रहे हैं और मौत की खबरें पांच से भी कम हो गई हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक, इसका मतलब यह है कि यहां के लोगों में हर्ड इम्यूनिटी विकसित हो गई, इसलिए मौत का आंकड़ा घट रहा है। शोधकर्ताओं का कहना है कि इस स्थिति में वायरस कमजोर पड़ जाते हैं।  शोधकर्ताओं के अनुसार, स्वीडन में जबतक 7.3 फीसदी आबादी में संक्रमण फैला था, तबतक मौत का आंकड़ा 5,280 पहुंचा। लेकिन जब कोरोनावायरस 14 फीसदी आबादी तक पहुंचा, तो मौतें काफी कम हो गईं थीं। इस आधार पर कहा जा सकता है कि 10 से 15 फीसदी तक संक्रमण फैलने पर वायरस का खतरा कम हो जाता है।

स्पने में कारगर नहीं हुई हर्ड इम्युनिटी

भले ही स्वीडन में हर्ड इम्युनिटी कारगर साबित हो गई है, लेकिन स्पेन में इस बात को लागू नहीं किया जा सकता है। कोरोनावायरस से यूरोपीय देशों में स्पेन सबसे अधिक प्रभावित हुआ। स्पेन में सिर्फ पांच फीसदी लोगों में ही हर्ड इम्यूनिटी विकसित हुई। वहीं, 95 फीसदी लोग कोरोनावायरस के प्रति अतिसंवेदनशील पाए गए हैं। यह परिणाम इस बात को साबित करते हैं कि सिर्फ हर्ड इम्यूनिटी के बल पर कोरोनावायरस के संक्रमण को नियंत्रित नहीं किया जा सकता है।

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