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इन वजहों से अमेरिका में बढ़े कोविड-19 के मामले, जानें क्यों रहा अमेरिका महामारी रोकने में असफल

दिसंबर 2019 में चीन के वुहान से  महामारी फैलने की ख़बरे सबसे पहले आयी थीं। जिसके बाद चीन ने तुरंत महामारी की रोकथाम के लिए  कदम उठाए और इन कारगर तरीकों से वायरस के प्रसार को रोकने में सफल हुए।  इसी तरह सिंगापुर, दक्षिण कोरिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों ने भी न्यूक्लिक एसिड टेस्ट किए और उन्हें स्ट्रॉन्ग भी बनाया, जो  महामारी पर नियंत्रण पाने में सफलता पायी। लेकिन,  वहीं महाशक्ति कहलाने वाला अमेरिका (Coronavirus in USA) इस दिशा में सफल नहीं हो पाया। लेकिन, ऐसे में यह भी सवाल उठता है कि रशिया और  अमेरिका जैसे बड़े देश  महामारी के सामने कमज़ोर क्यों साबित हुए हैं

Covid-19 Outbreak: कोविड-19 महामारी की रोकथाम के लिए कई देश प्रयास कर रहे हैं। दिसंबर 2019 में चीन के वुहान से  महामारी फैलने की ख़बरे सबसे पहले आयी थीं। जिसके बाद चीन ने तुरंत महामारी की रोकथाम के लिए  कदम उठाए और इन कारगर तरीकों से वायरस के प्रसार को रोकने में सफल हुए।  इसी तरह सिंगापुर, दक्षिण कोरिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों ने भी न्यूक्लिक एसिड टेस्ट किए और उन्हें स्ट्रॉन्ग भी बनाया, जो  महामारी पर नियंत्रण पाने में सफलता पायी।

इसीलिए, ऐसा कहा जा सकता है कि कुछ देशों को महामारी की रोकथाम की दिशा में सफलता मिली है और उन्होंने इस दिशा में काम भी किया है। लेकिन,  वहीं महाशक्ति कहलाने वाला अमेरिका (Coronavirus in USA) इस दिशा में सफल नहीं हो पाया। लेकिन, ऐसे में यह भी सवाल उठता है कि रशिया और  अमेरिका जैसे बड़े देश  महामारी के सामने कमज़ोर क्यों साबित हुए हैं।

क्यों रहा अमेरिका कोरोना महामारी रोकने में असफल?

महामारी की रोकथाम में अमेरिका के लगभग हर कदम विफल रहे हैं। महामारी फैलने की चेतावनी मिलने के बाद अमेरिका ने मुकाबले की पर्याप्त तैयारी नहीं की। महामारी फैलने के बाद अमेरिका में प्रभावी टेस्ट उपलब्ध नहीं हो सकता, यहां तक कि चिकित्सकों और नागरिकों को बुनियादी सुरक्षा उपकरण नहीं मिल सकते। हालांकि बाद में न्यूक्लिक एसिड टेस्ट की संख्या बढ़ी, लेकिन जनसंख्या की तुलना में टेस्ट की क्षमता फिर भी कम है। इसके साथ टेस्ट का परिणाम पाने में बहुत समय लगता है, इसलिए अमेरिका ने वायरस पर नियंत्रण करने का सबसे अच्छा मौका खोया।

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सर्वे और एक्सपर्ट्स के अनुसार, कोविड-19 की रोकथाम की दिशा में अमेरिका की कार्यवाहियां भी काफी धीमे हैं। काफी ज्यादा रिहायशी क्षेत्रों में जब महामारी बड़े पैमाने पर फैलने लगी, तब सरकार ने नागरिकों से अलगाव करने का सुझाव दिया। बहुत क्षेत्रों में सामाजिक दूरी के नियम का ठोस कार्यांवयन नहीं किया गया। और खतरनाक है कि महामारी पर नियंत्रण न होने की स्थिति में रोकथाम के प्रतिबंधों को शिथिल किया गया।

नागरिकों की भागीदारी भी आवश्यक:

इसके अलावा, अमेरिका के अधिकांश क्षेत्रों में लोग मास्क नहीं पहनते हैं, क्योंकि अमेरिकी नेताओं ने कहा था कि मास्क सिर्फ राजनीतिक उपकरण है, महामारी की रोकथाम में इसका ज्यादा फायदा नहीं। टीके के अनुसंधान का भी राजनीतिकीकरण किया गया, जिससे नागरिकों में अविश्वास बढ़ा।

अमेरिका में मजबूत उत्पादन क्षमता है, सार्वजनिक स्वास्थ्य और बेसिक बायोमेडिसिन के अध्ययन में इसकी श्रेष्ठता भी है, जो नये उपचार और रोकथाम के कदम में बदला जाना चाहिए, लेकिन अमेरिकी नेताओं ने विज्ञान को नजरअंदाज किया, यहां तक कि चिकित्सा विशेषज्ञों पर कालिख पोती। इससे विज्ञान और सरकार पर लोगों का विश्वास कम हुआ और अफवाह के फैलाव को बढ़ावा दिया गया।

अमेरिका ने महामारी की रोकथाम में विफलता के लिए भारी कीमत चुकायी। महामारी से अल्पसंख्यक जातीय क्षेत्रों में गंभीर नुकसान पहुंचा और नस्लीय समस्या भी गंभीर हुई है। अब अमेरिका में पुष्ट और मौत के मामलों की संख्या दुनिया के पहले स्थान पर है। महामारी एक देश की नेतृत्व क्षमता के लिए परीक्षण है, खेद है कि अमेरिका इस परीक्षण में असफल रहा। अमेरिका में महामारी का संकट दुखांत घटना में बदल गया है।

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