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Written By: Atul Modi | Published : August 30, 2022 6:26 PM IST
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के शोधकर्ताओं ने चिकित्सा के क्षेत्र में एक बार फिर दुनिया के सामने मिसाल पेश की है। दरअसल, शोधकर्ताओं ने पित्त की थैली के कैंसर के विकास के लिए जिम्मेदार म्यूटेशन की पहचान की है। यह एक ऐसा कैंसर है जो ज्यादातर 45 वर्ष से अधिक आयु की महिलाओं में देखा गया है, वहीं पुरुषों में इस प्रकार का कैंसर महिलाओं की अपेक्षा 5% कम है। ध्यान देने वाली बात यह है कि, पित्ताशय के कैंसर में व्यक्ति के जिंदा रहने की दर मात्र 10 से 20% ही है। मानव शरीर में पित्त की थैली यानी गॉलब्लैडर का काम पित्त को संग्रहित करना और भोजन के बाद पित्त नली के माध्यम से छोटी आंत में पित्त का स्राव करना है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, काशी हिंदू विश्वविद्यालय में पिछले 25 वर्षों से पित्त की थैली के कैंसर पर शोध कार्य चल रहा है, इसके अंतर्गत कैंसर के कारकों का पता लगाने पर अध्ययन किया जा रहा है। जिसमें शोधकर्ताओं को अब जाकर सफलता मिली है। विश्वविद्यालय के चिकित्सा विज्ञान संस्थान के सर्जिकल ऑंकोलॉजी में प्रोफेसर मनोज पांडे की अगुवाई में चल रहे शोध कार्य के अंतर्गत शोधकर्ताओं ने पित्त की थैली के कैंसर के विकास के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार ड्राइवर म्यूटेशन को खोज निकाला है। साल 2016 में शुरू किए गए शोध में पित्ताशय कैंसर के 33 मरीजों के अध्ययन में 27 सोमेटिक म्यूटेशन पाए गए, जो 14 प्रमुख जीन में मिले।
पित्त की थैली का कैंसर खासकर गंगा नदी के बेसिन में रहने वाली आबादी में काफी अधिक देखने को मिलता है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) स्थित सर सुंदरलाल चिकित्सालय में आने वाले मरीजों में करीब 5 प्रतिशत मरीज पित्त की थैली के कैंसर से पीड़ित होते हैं। पित्त की थैली का कैंसर के कारकों में हेवी मेटल और टाइफॉइड कैरियर को भी शामिल किया गया है। इस शोध कार्य में डॉ. सत्यविजय चिगुरुपति, डॉ. रोली पुरवर, मोनिका राजपूत तथा डॉ. मृदुला शुक्ला शामिल हैं। इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित विज्ञान शोध पत्रिका मॉलेक्युलर बायोलॉजी रिपोर्ट्स के हाल ही के अंक में प्रकाशित हुए हैं।
बायोइन्फोर्मेटिक अध्ययन के दौरान पाथवे (कोशिकाओं के बीच अंतर्सबंध व सम्पर्क) और इन पाथवे के बीच क्रॉस टॉक की पहचान की गई। अध्ययन के दौरान सामने आया कि आपसी सम्पर्क कर रही कोशिकाओं व पाथवे के बीच जटिल अंतसंर्बंध होता है, जिसकी वजह से एमटीओआर सिग्नल के माध्यम से पित्ताशय के कैंसर का विकास होता है, ऐसे में एमटीओआर (एक प्रकार का जीन) केन्द्रित उपचार इस प्रकार के कैंसर के उपाय का कारगर विकल्प हो सकता है। यूं तो एमटीओआर के असर को कम करने वाले अणु अन्य उपचारों के लिए स्वीकृत व उपलब्ध हैं, किंतु पित्ताशय के कैंसर के लिए अभी तक इनका इस्तेमाल नहीं हुआ है।
प्रो. मनोज पांडे के अनुसार पित्ताशय के कैंसर के ड्राइवर म्यूटेशन की पहचान पहली बार की गई है, जिससे इस संबंध में लंबे समय से चल रही कशमकश का काफी हद तक समाधान भी मिल पाया है। हालांकि, उन्होंने कहा कि यह अभी भी शोध का विषय है कि इस भौगोलिक क्षेत्र में ही इस प्रकार के म्युटेशन क्यों हो रहे हैं।
प्रो. पांडे बताते हैं कि यह अध्ययन पित्ताशय के कैंसर के उपचार में एवरोलीमस तथा टेमसिरोलीमस दवाओं के इस्तेमाल की राह दिखाता है। ये दोनों दवाएं एमटीओआर के असर को कम करती हैं तथा ट्यूमर कोशिकाओं के विकास व विस्तार को रोकने में असरदार हैं। फिलहाल इनका उपयोग स्तन कैंसर, न्यूरो एन्डोक्राइन कैंसर और गुर्दे के कैंसर में किया जाता है।
प्रो. पांडे के शोध दल ने पित्ताशय के कैंसर में एमटीओआर को नियंत्रित करने वाली दवाओं के बारे में क्लिनीकल ट्रायल के बारे में एक प्रस्ताव दिया है। अगर यह सफल होता है तो यह पित्ताशय के कैंसर, जिसे अब तक लाइलाज बीमारी समझा जाता है, से पीड़ित रोगियों के लिए उम्मीद की एक नई किरण लेकर आएगा।
Inputs: IANS