आयुर्वेदिक दवाओं को अब विदेशों में मिलेगी मान्यता,आयुष मंत्रालय की पहल

मंत्रालय के अनुसार भारत में स्वीकृत आयुर्वेद, यूनानी एवं सिद्ध की दवाओं को विदेशों में भी स्वत: ही कानूनी मान्यता होती है। लेकिन हर देश के दवा नियामक के अलग-अलग नियम हैं, जिनके तहत दवाओं को गुजरना होता है।

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Written By: Editorial Team | Updated : October 27, 2018 12:05 PM IST

आयुर्वेद एवं अन्य देशी चिकित्सा पद्धतियों की दवाओं और इन पैथियों के डॉक्टरों को विदेशों में भी मान्यता मिलेगी। राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस के मौके पर सरकार यह पहल करने जा रही है। इसके फलस्वरूप आने वाले दिनों में आयुर्वेद की दवाएं विदेशों में दवा के रूप में बिक सकेंगी और डॉक्टर भी वहां प्रैक्टिस कर सकेंगे। आयुष मंत्रालय इसके लिए प्रयास कर रहा है। मंत्रालय के अनुसार, पिछले कुछ सालों के दौरान आयुर्वेद से कई सफल दवाएं निकाली गई हैं। इनमें जैसे मधुमेह की दवा बीजीआर-34 ऐसी दवा है, जिसे वैज्ञानिक एवं औद्यौगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) ने आधुनिक वैज्ञानिक पद्धति से तैयार कर बाजार में उतारा है। इसके क्लिनिकल ट्रायल भी हुए हैं।

इसी तरह गर्भनिरोधक 'सहेली', आर्थराइटिस की दवा समेत कई दवाएं हैं, लेकिन विदेशों में यह दवा के रूप में इसलिए अभी तक नहीं बिक पाती हैं, क्योंकि इन्हें वहां के नियमों के मुताबिक दवा के रूप में पंजीकृत नहीं कराया गया। मंत्रालय डब्ल्यूएचओ की मदद से दवाओं के लिए मानक तय करने के बाद इन्हें हर देश में वहां के नियमों के अनुरूप दवा के रूप में पंजीकृत कराएगा। तब ये पोषक पदार्थ के रूप में नहीं बल्कि दवा के रूप में बिकेंगी।

आयुष मंत्रालय की इस पर पहल पर एमिल फार्मास्युटिकल के कार्यकारी निदेशक संचित शर्मा ने कहा, "यह भारत के लिए गर्व की बात होगी कि हमारे आयुर्वेद को दवा के रूप में दूसरे देशों के नागरिक भी अपनाएं। वे आयुर्वेद का लाभ उठाने के लिए भारत आते हैं, लेकिन अब उन्हें अपने देश में ही ये दवाएं तय नियमों के तहत मिलेंगी।"

मंत्रालय के अनुसार भारत में स्वीकृत आयुर्वेद, यूनानी एवं सिद्ध की दवाओं को विदेशों में भी स्वत: ही कानूनी मान्यता होती है। लेकिन हर देश के दवा नियामक के अलग-अलग नियम हैं, जिनके तहत दवाओं को गुजरना होता है। आयुष मंत्रालय इन दवाओं को उन नियमों के अनुरूप लाने की तैयारी कर रहा है। जैसे दवाओं के पेटेंट हों। उनके क्लिनिकल ट्रायल किए जाएं। दवाएं गुड मैन्युफैक्च रिंग प्रैक्टिस (जीएमपी) के अनुरूप बनाई जाएं।

इसी प्रकार कई देशों में स्विट्रजरलैंड, आस्ट्रेलिया, यूएई, कोलंबिया, हंगरी, क्यूबा, न्यूजीलैंड समेत कई देशों में कुछ औपचारिकताएं पूरी करने के बाद आयुर्वेद चिकित्सकों को प्रैक्टिस करने की अनुमति दी जाने लगी है। यह भी बड़ी उपलब्धि है। इनमें से कई देशों में भारतीय चिकित्सकों को टेस्ट पास करना जरूरी होता है। कुछ देशों में अलग से एड ऑन कोर्स करना होता है।

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