शोध : देर से सोने और उठने वाले बच्चों को होता है अस्थमा और एलर्जी का खतरा, पढ़ें पूरी रिपोर्ट
यह ऐसी पहली रिसर्च में जिसमें यह बताया गया है कि किस तरह किशोरों की नींद उन्हें अस्थमा और एलर्जी की चपेट में ला सकती है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह अध्ययन बताता है कि किशोरों के लिए नींद कितनी महत्वपूर्ण है और नींद कैसे किशोरों के श्वसन स्वास्थ्य को भी प्रभावित करती है।
अगर आप या आपके बच्चे भी उनमें से हैं जो रात में देर से सोते हैं और सुबह भी देर से उठते हैं तो सतर्क हो जाइए। हाल ही में हुए एक शोध में खुलासा हुआ है कि ऐसे बच्चे अस्थमा और एलर्जी जैसे रोगों का शिकार हो सकते हैं। जरनल ईआरजे ओपन रिसर्च में प्रकाशित हालिया अध्ययन में कहा गया है कि जो किशोर रात में देर से सोना और सुबह देर से उठना पसंद करते हैं, वो जल्दी सोने और उठने वालों की तुलना में अस्थमा और एलर्जी की चपेट में आते हैं। यह बात तो पहले से ही जगजाहिर है कि अस्थमा रोग किस तरह आपकी बॉडी की आंतरिक घड़ी के साथ दृढ़ता से जुड़ा होता है। लेकिन यह ऐसी पहली रिसर्च में जिसमें यह बताया गया है कि किस तरह किशोरों की नींद उन्हें अस्थमा और एलर्जी की चपेट में ला सकती है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह अध्ययन बताता है कि किशोरों के लिए नींद कितनी महत्वपूर्ण है और नींद कैसे किशोरों के श्वसन स्वास्थ्य को भी प्रभावित करती है।
अध्ययन का नेतृत्व कनाडा की यूनिवर्सिटी ऑफ अल्बर्टा में डिविजन ऑफ पल्मोनरी मेडिसिन से डॉ सुभब्रत मोइत्रा ने किया, जिन्होंने बार्सिलोना इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल हेल्थ, स्पेन में शोध किया था। उन्होंने कहा: “अस्थमा और एलर्जी की बीमारी दुनिया भर के बच्चों और किशोरों में आम है और बहुत तेजी से बढ़ भी रही है। वह कहते हैं कि इन दोनों के बढ़ने के कुछ कारणों से तो हम वाकिफ हैं। जैसे कि प्रदूषण, तंबाकू और धूल मिट्टी आदि लेकिन अभी भी हमें इसके पीछे के अन्य कारणों को जानने की आवश्यकता है। "स्लीप और स्लीप हार्मोन 'मेलाटोनिन अस्थमा को प्रभावित करने के लिए जाना जाता है, इसलिए हम यह देखना चाहते थे कि किशोरों के देर से सोने या जल्दी सोने जैसी आदतें उनके अस्थमा जोखिम में शामिल हो सकती है या नहीं।"
इस अध्ययन में भारत के पश्चिम बंगाल राज्य के 13 या 14 वर्ष की आयु के 1,684 ऐसे किशोर शामिल थे जिन्होंने किशोरों और एलर्जी संबंधी बीमारियों के प्रसार और जोखिम कारकों में भाग ले रहे थे। प्रत्येक प्रतिभागी से पूछा गया कि उन्हें जोर जोर से या कठिनाई से सांस लेने में दिक्कत होती है या नहीं, अस्थमा या एलर्जी राइनाइटिस के लक्षणों जैसे बहती नका या छींक जैसे किसी लक्षण का अनुभव होता है या नहीं। यह जानने के लिए उनसे कई प्रश्न पूछे गए कि क्या वे शाम या रात में किस समय थका हुआ महसूस करते हैं, सुबह किस समय उन्हें पहली बार थकान महसूस होती है आदि। शोधकर्ताओं ने अपनी नींद की वरीयताओं के साथ किशोरों के लक्षणों की तुलना की, जो अस्थमा और एलर्जी को प्रभावित करने वाले अन्य कारकों को ध्यान में रखते हैं, जैसे कि जहां प्रतिभागी रहते हैं और उनके परिवार के सदस्य धूम्रपान करते हैं।
उन्होंने पाया कि जिन किशोरों को पहले सोना पसंद था, उनकी तुलना में बाद में सोने वाले किशोरों में अस्थमा होने की संभावना तीन गुना अधिक होती है। उन्होंने यह भी पाया कि शुरुआती स्लीपर्स की तुलना में देर से सोने वालों में एलर्जिक राइनाइटिस से पीड़ित होने का जोखिम भी दोगुना था। डॉ मोइत्रा कहते हैं: “ये रिजल्ट साफ बताते हैं कि किशोरों के सोने के समय और अस्थमा और एलर्जी के बीच एक संबंध है। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ देर से सोने वाले बच्चे ही अस्थमा का शिकार होते हैं। लेकिन हम जानते हैं कि स्लीप हार्मोन मेलाटोनिन अक्सर देर से सोने वालों में कम हो जाता है और इससे किशोरों की एलर्जी प्रतिक्रिया प्रभावित हो सकती है। हम यह भी जानते हैं कि आजकल बच्चों और युवाओं का मोबाइल फोन, टैबलेट और अन्य उपकरणों से मोह बढ़ गया है जिसके चलते वह उनके इस्तेमाल में इतने बिजी हो जाते हैं कि रात में देर से सोना मानो उन्हें अच्छा लगता है। यह हो सकता है कि किशोरों को अपने उपकरणों को रखने और थोड़ा पहले बिस्तर पर लाने के लिए प्रोत्साहित करने से अस्थमा और एलर्जी के जोखिम को कम करने में मदद मिलेगी।”