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ऑर्थराइटिस से बचने के लिए शारीरिक रुप से सक्रिय रहना है ज़रूरी, एक्सपर्ट की राय

ऑर्थराइटिस की रोकथाम के लिए चलना-फिरना ज़रूरी

ऑर्थराइटिस से बचने के लिए शारीरिक रुप से सक्रिय रहना है ज़रूरी, एक्सपर्ट की राय
भारत में ऑस्टियोऑर्थराइटिस आमतौर पर 55-60 की उम्र में होता है, लेकिन आज कम उम्र में भी लोग ऑर्थरिटिस और अपंगता का शिकार बन रहे हैं।© Shutterstock

Written by Sadhna Tiwari |Updated : October 14, 2018 11:32 AM IST

ऑर्थराइटिस में जोड़ों में सूजन आ जाती है, जिसके कारण मरीज को चलने-फिरने में परेशानी होने लगती है। आज के शहरी लोग बिल्कुल गतिहीन हो गए हैं, जिसका बुरा असर उनके मांस और हड्डियों की ताकत पर पड़ता है। आज ऑर्थराइटिस (खासतौर पर घुटनों का ऑर्थराइटिस) महामारी का रूप ले रहा है। उम्र के साथ होने वाला ऑर्थराइटिस ऑस्टियोऑर्थराइटिस कहलाता है। भारत में ऑस्टियोऑर्थराइटिस आमतौर पर 55-60 की उम्र में होता है, लेकिन आज कम उम्र में भी लोग ऑर्थरिटिस और अपंगता का शिकार बन रहे हैं।

नोएडा स्थित जेपी हॉस्पिटल के डिपार्टमेंट ऑफ आथ्रोपेडिक्स एंड जॉइंट रिप्लेसमेंट के एसोसिएट निदेशक डॉक्टर गौरव राठोर का कहना है कि अक्सर लोग ऑस्टियोपोरोसिस और ऑस्टियोऑर्थराइटिस को एक ही समझ लेते हैं। ऑस्टियोऑर्थराइटिस में जोड़ों में डीजनरेशन होने लगता है, वहीं ऑस्टियोपोरोसस में हड्डियों में मांस कम होने लगता है और हड्डियां टूटने या फ्रैक्च र होने की संभावना बढ़ जाती है। ऑस्टियोपोरोसिस को मूक रोग कहा जा सकता है क्योंकि अक्सर सालों तक मरीज को इसका पता ही नहीं चलता, जब हड्डियां टूटने लगती हैं, तब इस बीमारी का पता चल पाता है। ऑस्टियोपोरोसिस में मरीज को दर्द नहीं होता, लेकिन दर्द तभी होता है जब फ्रैक्च र हो जाता है।

डॉ. राठोर ने कहा कि ऑर्थराइटिस का सबसे आम प्रकार है ऑस्टियोऑर्थराइटिस : इसका असर जोड़ों, विशेष रूप से कूल्हे, घुटने, गर्दन, पीठ के नीचले हिस्से, हाथों और पैरों पर पड़ता है। ऑस्टियोऑर्थराइटिस आमतौर पर कार्टिलेज जॉइन्ट में होता है। कार्टिलेज हड्डियों की सतह पर मौजूद सॉफ्ट टिश्यू है, जो ऑर्थराइटिस के कारण पतला और खुरदरा होने लगता है। इससे हड्डियों के सिरे पर मौजूद कुशन कम होने लगते हैं और हड्डियां एक दूसरे से रगड़ खाने लगती हैं।

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ऑर्थराइटिस के लक्षण इसके प्रकार पर निर्भर करते हैं। इसमें दर्द, अकड़न, ऐंठन, सूजन, हिलने-डुलने या चलने-फिरने में परेशानी होने लगती है।

उनके अनुसार, ऑर्थराइटिस का मुख्य कारण जीवनशैली से जुड़ा है। भारतीय आबादी में खान-पान के तरीके भी इस बीमारी का कारण बन चुके हैं। शहरी लोग आजकल कम चलते-फिरते हैं, जिससे उनकी शारीरिक एक्टिविटी का स्तर कम हो गया है। महिलाएं कई कारणों से ऑर्थराइटिस का शिकार हो रही हैं, जैसे चलने-फिरने में कमी, जिसके कारण मसल कम होना आजकल आम हो गया है।

डॉ. गौरव ने कहा कि ऑर्थराइटिस से अक्सर सबसे ज्यादा असर घुटनों, कूल्हों के जोड़ों पर पड़ता है। लगातार बैठे रहने के कारण से मांसपेशियां निष्क्रिय और कमजोर होने लगती हैं। पेशियों के कमजोर होने से ऑर्थरिटिस का दर्द बढ़ जाता है और मांसपेशियां खराब होने लगती हैं।

उन्होंने कहा कि शारीरिक एक्टिविटी कम होने के कारण मोटापा भी बढ़ता है, जो ऑर्थराइटिस के मुख्य कारणों में से एक है। ऑर्थराइटिस का असर मरीज के चलने-फिरने की क्षमता, रोजमर्रा के कामों पर पड़ता है। मरीज रोजाना के कामों में मुश्किल महसूस करने लगता है। समय के साथ कम चलने के कारण उसके कार्डियो-वैस्कुलर स्वास्थ्य पर असर पड़ने लगता है और डायबिटीज की संभावना भी बढ़ जाती है।

उनके अनुसार, ऑर्थराइटिस एजिंग यानी उम्र बढ़ने का एक हिस्सा है, लेकिन सही जीवनशैली के द्वारा इसकी संभावना को कम किया जा सकता है और ऑर्थराइटिस के कारण होने वाली अपंगता से बचा जा सकता है।

अच्छी जीवनशैली की शुरुआत बचपन से ही होती है। शुरूआती अवस्था में सक्रिय जीवन का अच्छा असर बाद के जीवन पर पड़ता है। अच्छे आहार और नियमित व्यायाम के द्वारा हड्डियों और मांसपेशियों को मजबूत बनाए रखा जा सकता है।

डॉ. राठोर के अनुसार, ऑर्थराइटिस से बचने का सबसे अच्छा तरीका है अपने वजन पर नियन्त्रण रखें। इसके लिए आहार में कार्बोहाइड्रेड का सेवन सीमित मात्रा में करें, ट्रांस-फैट के सेवन से बचें। ध्यान रखें कि आपके आहार में प्रोटीन की मात्रा भी सामान्य हो।

आजकल लोग उम्र के 50वें दर्शक में जोड़ों की समस्या के शिकार होने लगते हैं। मोटापा और मांसपेशियों की कमजोरी बीमारी को और बढ़ाते हैं। इसके लिए नियमित रूप से व्यायाम करें, ताकि जोड़ों का लचीलापन और गतिशीलता बनी रहे।

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ऑर्थराइटिस की शुरुआत में ही अगर व्यायाम शुरू कर दिया जाए तो घुटनों को खराब होने से बचाया जा सकता है। आप शारीरिक व्यायाम की मात्रा बढ़ाकर अपनी सेहत में सुधार ला सकते हैं। अच्छा मानसिक स्वास्थ्य भी बहुत जरूरी है।