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Written By: Yogita Yadav | Updated : November 30, 2018 2:00 PM IST
हवा हो गए हैं एचआईवी का सस्ता इलाज मुहैया करवाने के विभिन्न राष्ट्रों के संकल्प, फार्मा कंपनियां बना रही हैं मोटाफा मुनाफा। © Shutterstock
एचआईवी एक वायरस है, यह रोग प्रतिरक्षा प्रणाली की टी-कोशिकाओं पर हमला करता है, जिससे एड्स हो जाता है। यह मानव शरीर के तरल पदार्थों में पाया जाता है जैसे संक्रमित व्यक्ति के रक्त, वीर्य, योनि तरल पदार्थ, स्तन के दूध में जो दूसरों में सीधे संपर्क अर्थात रक्त आधान, ओरल सेक्स, गुदा सेक्स, योनि सेक्स या दूषित सुई का इंजेक्शन लगाने से फैलता है।
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यह प्रसव के दौरान या स्तनपान के माध्यम से गर्भवती महिलाओं से बच्चों में भी फैल सकता है। इसकी रोकथाम और निदान के लक्ष्य से पिछले तीस वर्ष से लगातार 1 दिसंबर को विश्व एड्स दिवस मनाया जा रहा है। इसके लिए राज्य और केंद्र सरकार ही नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष जैसे बड़े संस्थान भी पैसा खर्च कर रहे हैं। इसके बावजूद आज भी एड्स का उपचार बहुत महंगा है। कितने ही लोग उपचार अफोर्ड न कर पाने की स्थिति में बिना इलाज के ही दम तोड़ देते हैं।
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रोगियों तक पहुंचते कैसे बढ़ जाती है कीमत
इस साल की शुरुआत में अप्रैल में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने एड्स की वापसी के संबंध में तत्काल आवश्यकता की एक रिपोर्ट के सारांश को सुना। 2010 से एड्स से होने वाली मौतों में एक तिहाई की गिरावट आई, जबकि इसके बाद से इनकी संख्या में फिर से बढ़ोतरी देखी गई। यह सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बेहद चिंता का विषय है। इससे मालूम होता है कि स्वास्थ्य ढांचा बुरी तरह से चरमराया है।
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अप्रैल माह में ही एक्ट यूपी (AIDS Coalition to Unleash Power) जिसकी स्थापना 1 9 87 में हुई थी- ने न्यूयॉर्क शहर में फार्मास्युटिकल कंपनी गिलियड साइंसेज के एकाधिकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। एक्ट यूपी के इस विरोध प्रदर्शन का कारण एचआईवी संक्रमण का जोखिम कम करने वाली एक दवा ट्रुवाडा के मुद्दे पर था। एक्ट यूपी का कहना था कि ट्रुवाडा का एक कोर्स के निर्माण की लागत गिलियड साइंसेज को $ 6 / माह आती है जबकि यह रोगियों तक पहुंचते हुए आश्चर्यजनक रूप से $ 1,500 / माह हो जाती है। सबसे ज्यादा घृणित बात यह है कि इस दवा के लिए अनुसंधान को गिलियड साइंसेज के नहीं बल्कि सार्वजनिक धन और चेरिटेबल वित्त पोषित संस्थाओं से प्राप्त धन का इस्तेमाल किया गया था। यह अद्भुत घोटाला साबित करता है कि फार्मा कंपनियों के लिए एचआईवी / एड्स पैसा बनाने का माध्यम बन गई है।
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