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भारत में पहली बार वर्चुअल ब्रोंकोस्कोपी नेविगेशन (VBN) से फेफड़ों की बीमारी का इलाज

वर्चुअल ब्रोंकोस्कोपी नेविगेशन (VBN) फेफड़े की बीमारी का पता लगाने का सबसे एडवांस तरीका है।

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Written By: Editorial Team | Updated : April 27, 2018 1:58 PM IST

फेफड़े में कहां बीमारी है, वहां तक पहुंचने के लिए एम्स के डॉक्टरों ने सांस की नली के माध्यम से  वर्चुअल ब्रोंकोस्कोपी नेविगेशन (VBN)  इस्तेमाल करना शुरू किया है। यह तकनीक भारत में पहली बार प्रारम्भ की गई है। डॉक्टर सांस की नली से होते हुए फेफड़े की उसी खास जगह पर पहुंच जाते हैं, जहां बीमारी है। जिस तरह जीपीएस हम सबको रास्ता बताता है, वैसे ही यह मशीन फेफड़े में बीमारी तक पहुंचाती है। 23 अप्रैल 2018 को इस मशीन का इस्तेमाल एम्स के पल्मोनरी डिपार्टमेंट में प्रारम्भ हुआ। अब तक चार मरीजों का इससे इलाज हो चुका है।

पल्मोनरी डिपार्टमेंट के डॉक्टर करण मदान ने बताया कि इस सिस्टम को वर्चुअल ब्रोंकोस्कोपी नेविगेशन (VBN) कहा जाता है। यह फेफड़े की बीमारी का पता लगाने का सबसे एडवांस तरीका है। कई बार फेफड़े  में नॉड्यूल या स्पॉट बन जाता है, इसे डायग्नोस करना मुश्किल होता है। छाती के बीच से इंजेक्शन दिया जाता है और फिर वहां से लंग्स का टुकड़ा निकाला जाता है, इसमें रिस्क रहता है। इसकी वजह से यह डायग्नोस मिस भी हो जाता है।

डॉक्टर मदान ने बताया कि इसके जरिए सैंपलिंग सटीक हो सकती है। मरीज का सीटी स्कैन जब मशीन में डाला जाता है तो यह सीडी विंड पाइप के अंदर का मैप दिखाने लगती है। एक तरह से इसे विंड पाइप का जीपीएस या फिर सांस की नली का जीपीएस कह सकते हैं। सिस्टम उसी जगह पर लेकर जाता है, जहां नॉडयूल बना हुआ होता है। यह नॉडयूल कई बार कैंसर की वजह से भी हो सकता है। इससे हम सैंपल आसानी से ले पाते हैं और मरीज में कोई कॉम्प्लिकेशन भी नहीं होता।

इस बारे में डॉक्टर अनंत मोहन ने कहा कि फेफड़े के अंदर भी कई छोटे-छोटे रास्ते होते हैं, ऐसे में मैप से सटीक जगह पर पहुंच सकते हैं। जब नॉडयूल बहुत छोटे होते हैं तो डायग्नोस नहीं हो पाते, लेकिन वह कैंसर की पहली स्टेज भी हो सकती है। लेकिन डायग्नोस नहीं होने की वजह वह छुट जाता है। आमतौर पर देश में फेफड़े के कैंसर वाले मरीज तीसरे और चौथे स्टेज में इलाज के लिए पहुंचते हैं, तब जाकर उनकी जांच हो पाती है, जिसकी वजह से उन पर ट्रीटमेंट का उतना असर नहीं हो पाता। अगर पहले स्टेज में पता चल जाए तो पूरा इलाज संभव होता है।

स्रोत:IANS Hindi 

चित्रस्रोत:Shutterstock.