बुजुर्गो में आम है आंख की बीमारी- मैक्यूलर डिजनरेशन यानि एएमडी !

मैक्यूला के क्षतिग्रस्त होने पर इसे दोबारा ठीक करना मुमकिन नहीं है। इससे दुनियाभर में करीब 8.7 फीसदी लोग अंधेपन का शिकार होते हैं।

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Written By: Editorial Team | Published : August 20, 2018 5:06 PM IST

बुजुर्ग लोगों में शारीरिक क्षमता कम होने के साथ उम्र से जुड़े कई रोग भी घेर लेते हैं। इसमें सबसे गंभीर आंखों की बीमारियां है क्योंकि रेटिना की बीमारियों, जैसे उम्र से जुड़ी मैक्यूलर डिजनरेशन (एएमडी) का समय पर इलाज न कराने से बुजुर्गों को अंधापन भी हो सकता है। अंतर्राष्ट्रीय वरिष्ठ नागरिक दिवस के अवसर पर लोगों को यह बताना महत्वपूर्ण है कि एएमडी ग्रस्त रोगियों में डिप्रेशन का स्तर सामान्य बुजुर्गों और अन्य गंभीर बीमारियों से ग्रस्त बुजुर्गों के मुकाबले काफी ज्यादा है। वैज्ञानिकों ने उम्र से जुड़े मैक्यूलर डिजनरेशन से जुड़े डिप्रेशन, विजअल एक्यूटी, कोमोरबिडी एंड डिसएब्लेटी और उम्र से जुड़े मैक्यूलर डिजनरेशन का विजन पर पड़ने वाली कार्यक्षमता के इफैक्ट्स ऑफ डिप्रेशन की दिशा में रिसर्च की तो पाया कि एक तिहाई एएमडी रोगी डिप्रेशन में थे।

एएमडी को साधारण भाषा मंे समझा जाए तो जिस तरह कैमरे मंे मौजूद फिल्म पर तस्वीर बनती है, ठीक उसी तरह से हमारी आंखों के रेटिना में तस्वीर बनती है। अगर रेटिना खराब हो जाए तो आंखों की रोशनी जा सकती है। इस बीमारी में मैक्यूल (रेटिना के बीच के भाग में) असामान्य ब्लड वैसेल्स बनने लगते हैं जिससे केंद्रीय दृष्टि प्रभावित होती है और इससे बुजुर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं।

मैक्यूला के क्षतिग्रस्त होने पर इसे दोबारा ठीक करना मुमकिन नहीं है। इससे दुनियाभर में करीब 8.7 फीसदी लोग अंधेपन का शिकार होते हैं।

एएमडी जैसी रेटिना से जुड़ी बीमारियों के बढ़ने का सबसे बड़ा कारण लोगों में जानकारी के अभाव के साथ लक्षणों की पहचान न कर पाना है, जिसकी वजह से बुजुर्गों की आंखों की रोशनी बहुत ज्यादा प्रभावित हो जाती है।

इस बारे में एम्स के पूर्व चीफ एवं सीनियर कंस्लटेंट विटरियोरेटिनल सर्जन और ऑल इंडिया कोलेजियम ऑफ ओपथालमोलोजी के प्रेजिडेंट डॉ. राजवर्धन आजाद कहते हैं, "रेटिनल बीमारियों जैसे कि एएमडी में धुंधला या विकृत या देखते समय आंखों में गहरे रंग के धब्बे दिखना, सीधी दिखने वाली रेखाएं लहराती या तिरछी दिखना लक्षण हैं। आमतौर पर रेटिनल बीमारियांे की पहचान नहीं हो पाती क्योंकि इसके लक्षणों से दर्द नहीं होता और एक आंख दूसरी खराब आंख की क्षतिपूर्ति करती है। यह तो जब एक आंख की रोशनी बहुत ज्यादा चली जाती है और मरीज एक आंख बंद करके देखते है तो पता चलता है कि उनकी आंख में समस्या है। इसलिए इसके लक्षणों को समझना जरूरी है और इसकी पहचान करके विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए ताकि आंखों की रोशनी को बचाया जा सके।"

एक तरफ बढ़ती उम्र का असर तो दूसरी तरफ बच्चों का अपने कैरियर और कामों में व्यस्त होने से बुजुर्ग खुद को बोझ समझने लगते है। ऐसे में अगर एएमडी के कारण आंखों की रोशनी चले जाए तो उन्हें परिवार पर या उनकी देखभाल करने वालों पर आश्रित रहना पड़ता है। एएमडी ग्रस्त बुजुर्गों को अपने दिन का काफी समय अकेले गुजारना पड़ता है और इस स्थिति में सही तरीके से न देख पाना उन्हें धीरे धीरे डिप्रेशन तक ले जाता है। इसलिए डिप्रेशन से बचने के लिए यह बहुत जरूरी है कि बुजुर्ग अपनी आंखों का खास ख्याल रखें और डॉक्टर द्वारा बताए गए किसी भी लक्षण के महसूस होने पर इसे उम्र से जुड़ी समस्या मानकर न बैठे रहे बल्कि तुरंत विशेषज्ञ से मिलें।

वैसे भी भारत मंे आजकल कई आधुनिक तकनीकें मौजूद है, जिसकी मदद से आंखों का बेहतरीन इलाज किया जा सकता है। कई मामलों में तो देखा गया है कि एएमडी के इलाज कराने से बीमारी की गति को धीमा या रोका जा सकता है। देश में कई विकल्प जैसे कि लेजर फोटोकॉग्यूलेशन, एंटी वीईजीएफ (वास्कुलर एंडोथेलियल ग्रोथ फैक्टर) इंजेक्शन और लेजर व एंटी वीईजीएफ का कॉम्बीनेशन इलाज है।

चित्रस्रोत :Shutterstock.

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