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Written By: Yogita Yadav | Published : June 18, 2019 2:37 PM IST
कुल 107 मृतकों में से एसकेएमसीएच में 88 और निजी केजरीवाल अस्पताल में 19 बच्चों की मौत हुई है। दोनों अस्पतालों में एईएस के लक्षणों वाले गंभीर रूप से बीमार लगभग 100 बच्चों का इलाज चल रहा है। © IANS
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मंगलवार को मुजफ्फरपुर का दौरा किया, जहां एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) से अब तक 107 बच्चों की मौत हो चुकी है। जिला के स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी ने कहा कि उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के साथ नीतीश कुमार ने सरकारी श्री कृष्णा मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (एसकेएमसीएच) का दौरा किया, जहां उन्होंने अपना इलाज करा रहे बच्चों और उनके परिजनों से मुलाकात की। बिहार में एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम केे कारण हालात काबू सेे बाहर हो गए हैं।
मुख्यमंत्री स्थिति का जायजा लेने के लिए डॉक्टरों और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक करेंगे। कुल 107 मृतकों में से एसकेएमसीएच में 88 और निजी केजरीवाल अस्पताल में 19 बच्चों की मौत हुई है। दोनों अस्पतालों में एईएस के लक्षणों वाले गंभीर रूप से बीमार लगभग 100 बच्चों का इलाज चल रहा है। स्थिति का जायजा लेने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने रविवार को एसकेएमसीएच का दौरा किया था।
एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम यानी चमकी बुखार का अब तक कोई इलाज नहीं है। तमाम कोशिशों और रिसर्च के बाद भी ऐसी कोई दवाई नहीं बनाई जा सकी, जिससे पीड़ित रोगियों का इलाज हो सके। यहां तक कि अभी तक इस बीमारी के पीछे के वायरस की भी पहचान नहीं हो सकी है। ऐसे में एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) के लिए इलाज के लिए वैक्सीन कैसे बन सकती है।
मुजफ्फरपुर और आसपास के इलाकों में बच्चों में ये बीमारी मई से शुरू होकर जुलाई तक चलती है। उसके बाद यह अपने आप खत्म हो जाती हैं। © Shutterstock.
मुजफ्फरपुर और आसपास के इलाकों में बच्चों में ये बीमारी मई से शुरू होकर जुलाई तक चलती है। उसके बाद यह अपने आप खत्म हो जाती हैं। बरसात के बाद यह बीमारी क्यों खत्म हो जाती है, ये भी एक रहस्य है। वैज्ञानिकों ने एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम पर काफी रिसर्च किया लेकिन जो कुछ भी नतीजे सामने आए हैं, वो बहुत ज्यादा विश्वास नहीं दिला पाते हैं।
वैज्ञानिकों की राय है कि लीची का सीजन इसी महीने में है। जब लीची पकने लगती है और टपक जाती है तो बच्चे लीची के बागान में जाकर गिरी हुई लीची को भी खा लेते हैं। जिसमें वायरस हो सकता हैं। लेकिन फिर यह 6 महीने साल भर के बच्चों के कैसे पाया जा रहा है यह सवाल उठता है।
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इस बीमारी की शुरुआत नब्बे के दशक में हो गई थी, लेकिन यह महामारी के रूप में साल 2011 में सामने आई। उन्होंने कहा कि साल 2011 में एईएस के रिसर्च पर एक टीम ने काम करना शुरू किया था। जिसके तहत वेक्टर बिलोजिस्ट टेस्ट किए गए। उन्होंने बताया कि रिसर्च टीम ने सीएसएफ स्पाइनल फ्लूड के सैम्पल नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (एनआईवी) पुणे को भेजे लेकिन रिपोर्ट नकारात्मक आई। साल 2014 में एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम के मामले बड़े पैमाने पर सामने आए।
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स्टडी में यह बात सामने आई है कि जब यूरिन की जांच करने पर उसमें ओरगोनोफोस्फोर्स पेस्टीसाइड की मात्रा पाई गई जोकि लीची की फसल पर पेस्टीसाइड के रूप में स्प्रे होता है। जब तक इस वायरस का आइडेंटिफाइड नहीं होता तब तक वैक्सीन नहीं बनाई जा सकती है। डॉक्टरों की टीम इस पर रिसर्च कर रही है। अभी तक वायरस आइडेंटिफाइ नहीं हुआ है।