बिहार में चमकी बुखार का कहर, बढ़ती जा रही है मरने वालों की संख्‍या

बिहार में प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी इस अज्ञात बीमारी से मरने वालों की संख्या 36 तक पहुंच गई है। हालांकि सरकार अभी 11 मौतों की ही बात कर रही है। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने कहा कि मुजफ्फरपुर में 11 बच्चों की मौत हुई, जिसमें एक बच्चे की मौत एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) से हुई है।

बिहार में चमकी बुखार का कहर, बढ़ती जा रही है मरने वालों की संख्‍या
बिहार में चमकी बुखार का कहर थम नहीं रहा है। अब तक कई बच्‍चों की इससे मौत हो चुकी हैं। 15 वर्ष तक की उम्र के बच्चे इस बीमारी की चपेट में आ रहे हैं। © DeccanHerald

Written by IANS |Published : June 12, 2019 12:11 PM IST

बिहार के मुजफ्फरपुर के श्रीकृष्ण मेमोरियल कॉलेज अस्पताल (एसकेएमसीएच) में बरूराज के पगठिया की रहने वाली आठ वर्षीय फरीदा की अम्मी शाहबानो के आंखों के आंसू रुक नहीं रहे हैं। उनकी फटी आंखें मानो गुजर चुकी फरीदा की पुरानी यादों को हर समय के लिए अपनी अंतरात्मा में बसा लेना चाहती हैं। तीन दिन पहले ही शाहबानो ने अपनी फूल-सी प्यारी बच्ची को तबियत ज्‍यादा खराब होने के कारण अस्पताल में भर्ती करवाया था, परंतु चिकित्सक उसे नहीं बचा सके। अब तो शाहबानो की मानो दुनिया ही उजड़ गई है।

डरे हुए हैं लोग

इधर, पूर्वी चंपारण के पकड़ीदयाल के पांच वर्षीय सोनू कुमार के पिता श्रीनिवास राय भी सोनू के लगातार चौंकने के कारण परेशान हैं। हालांकि आसपास के लोग उन्हें ढांढस बंधा रहे हैं कि अभी स्थिति ठीक है। बच्चे के पेट और सीने को बार-बार ठंडे पानी में कपड़ा भिगोकर धोया जा रहा है। चिकित्सक ग्लूकोज चढ़ा रहे हैं, परंतु उनके बगल के बेड पर भर्ती बच्चे के गुजर जाने के बाद उन्हें भी अपने बच्चे के बिछड़ जाने का डर सता रहा है। उन्हें अब किसी ऐसे भगवान का इंतजार है, जो उनके बच्चे को पूरी तरह स्वस्थ्य कर दे।

बढ़ रहा है चमकी बुखार का कहर

यह हाल पूरे एसकेएमसीएच में देखने को मिल रहा है। हर कोई अपने कलेजे के टुकड़े को बचाने के लिए अस्पताल के ट्रालीमैन तक के पैर पकड़ कर बच्चे को ठीक करने की गुहार लगा रहा है। अचानक क्षेत्र में 'चमकी बुखार' के कारण मरीजों की संख्या यहां बढ़ गई है। मुजफ्फरपुर के एसकेएमसीएच में अपने बच्चों को खो चुकी मांओं की दहाड़ सुन किसी भी व्यक्ति का कलेजा फट जा रहा है। खो चुके बच्चों की मांएं दहाड़ मार कर रो रही हैं, तो उनके पिता और परिजन उन्हें ढांढस बंधा रहे हैं।

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[caption id="attachment_671616" align="alignnone" width="655"]AES-Bihar बिहार में प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी इस अज्ञात बीमारी से मरने वालों की संख्या 36 तक पहुंच गई है।[/caption]

हर साल बरपाता है कहर, चमकी बुखार

बिहार में प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी इस अज्ञात बीमारी से मरने वालों की संख्या 36 तक पहुंच गई है। हालांकि सरकार अभी 11 मौतों की ही बात कर रही है। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने कहा कि मुजफ्फरपुर में 11 बच्चों की मौत हुई, जिसमें एक बच्चे की मौत एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) से हुई है। उन्होंने कहा कि अन्य बच्चों की मौत हाइपोग्लाइसीमिया यानी अचानक शुगर की कमी से हुई है।

36 तक पहुंचा मौत का आंकड़ा

इधर, मुजफ्फरपुर के एसकेएमसीएच और केजरीवाल अस्पताल में संदिग्ध एईएस या चमकी बुखार से मरने वालों की संख्या 36 तक पहुंच गई है। एसकेएमसीएच के अधीक्षक डॉ़ सुनील शाही ने मंगलवार को  बताया कि एसकेएमसीएच में मंगलवार को भी बुखार से पीड़ित बच्चे पहुंचे हैं, जिन्हें पीसीआईयू में भर्ती कराया गया है। उन्होंने कहा कि "इस अस्पताल में अब तक 90 पीड़ित बच्चों को भर्ती कराया गया है, जिसमें से इलाज के दौरान 32 बच्चों की मौत हो चुकी है।"

शुगर और सोडियम की कमी

उन्होंने कहा, "इनमें से अधिकांश बच्चों में हाइपोग्लाइसीमिया यानी अचानक शुगर की कमी और कुछ बच्चों के शरीर में सोडियम (नमक) की मात्रा भी कम पाई जा रही है। एईएस के संदिग्ध मरीजों का इलाज शुरू करने से पहले चिकित्सक उसकी जांच कराते हैं।" उन्होंने कहा, "एईएस कोई बीमाारी नहीं है। इसमें कई 'डिजीज' पाए जाते हैं, जिसमें एक 'चमकी बुखार' भी है।"

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15 साल से छोटे बच्‍चों को है ज्‍यादा जोखिम

इधर, केजरीवाल अस्पताल के प्रबंधक ने कहा कि "एक सप्ताह के भीतर यहां चमकी बुखार से पीड़ित 42 बच्चों को भर्ती किया गया, जिसमें से चार बच्चों की मौत हो गई। सात बच्चों का अभी भी इलाज चल रहा है।" गौरतलब है कि 15 वर्ष तक की उम्र के बच्चे इस बीमारी की चपेट में आ रहे हैं। इस कारण मरने वालों में अधिकांश की आयु एक से सात वर्ष के बीच है। इस बीमारी का शिकार आमतौर पर गरीब परिवार के बच्चे होते हैं। चिकित्सकों के मुताबिक, इस बीमारी का मुख्य लक्षण तेज बुखार, उल्टी-दस्त, बेहोशी और शरीर के अंगों में रह-रहकर कंपन (चमकी) होना है।

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नहीं हो पा रहा नियंत्रण

उल्लेखनीय है कि प्रत्येक वर्ष इस मौसम में मुजफ्फरपुर क्षेत्र में इस बीमारी का कहर देखने को मिलता है। पिछले वर्ष गर्मी कम रहने के कारण इस बीमारी का प्रभाव कम देखा गया था। इस बीमारी की जांच के लिए दिल्ली से आई नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल की टीम तथा पुणे के नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ वायरोलॉजी (एनआईवी) की टीम भी मुजफ्फरपुर का दौरा कर चुकी है।

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