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Written By: Anshumala | Published : May 30, 2019 10:03 AM IST
कुछ व्यायामों और एक्वेटिक एक्सरसाइज करने से मल्टीपल स्केलेरोसिस के लक्षणों को कम किया जा सकता है। © Shutterstock.
जो लोग मल्टीपल स्क्लेरोसिस से पीड़ित हैं, उन्हें नियमित रूप से एक्वेटिक एक्सरसाइज और योग के कुछ आसानों को करने से लाभ होता है। मल्टीपल स्क्लेरोसिस में योग करना, इस बीमारी के लक्षणों को काफी हद तक कम कर देता है। यह बात एक शोध में कही गई है। योग के कुछ व्यायामों का मल्टीपल स्केलेरोसिस (एमएस) के कुछ खास लक्षणों जैसे थकान, अवसाद और अपसंवेदन पर सकारात्मक प्रभाव हो सकता है। एक अध्ययन के अनुसार, मल्टीपल स्क्लेरोसिस में योग के आठ हफ्ते के कार्यक्रम और जलीय व्यायामों (Aquatic exercises) से मरीजों में इनके लक्षण में पर्याप्त कमी देखी गई।
मल्टीपल स्क्लेरोसिस (एमएस) एक दीर्घकालिक व तेजी से बढ़ने वाला स्व प्रतिरक्षित बीमारी है, जिसमें प्रतिरक्षी तंत्र नसों के ऊत्तकों पर हमला करते हैं। इसके परिणाम स्वरूप संभवत: अंगों को चलाने में गड़बड़ी होती है। एमएस के अन्य खास लक्षण शारीरिक और मानसिक थकान के साथ-साथ बेहोशी, अवसाद और पेट में पिन और सूई जैसी चुभन, खुजली और संवेदनशून्यता है।
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'मेडिसिन एंड साइंस इन स्पोर्ट्स एवं एक्सरसाइज' नामक पत्रिका में शोधकर्ताओं की यह रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी। इसमें कहा गया है कि व्यायाम सिखाने के कार्यक्रम को एमएस के मानक इलाज के साथ भविष्य के संभावित पूरक के रूप में चलाने पर विचार किया जाना चाहिए। अध्ययन दल ने एमएस से पीड़ित 54 महिलाओं का विश्लेषण किया, जिनकी औसत उम्र 34 साल थी। इन्हें तीन समूहों में रखा गया। एक योग का था, दूसरा एक्वेटिक एक्सरसाइज वाला था और तीसरा जो बिल्कुल व्यायाम नहीं करता था।
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इस परीक्षण के पहले और बाद में मरीजों से उनके लक्षणों के बारे में एक पूरी प्रश्नावली पूछी गई। सभी मरीजों का जो इलाज चल रहा था उसे जारी रहने दिया गया। खासकर, जो प्रतिरक्षी तंत्र ठीक करने के लिए दवा लेती थीं, उन्हें दवा लेते रहने दिया गया। परिणाम से यह खुलासा हुआ कि जिन मरीजों ने हफ्ते में तीन बार प्रशिक्षण कार्यक्रम में हिस्सा लिया, उनकी थकान और अवसाद में बहुत कमी आई थी। खासकर, उनकी तुलना में जिन्होंने ऐसा नहीं किया था।
योग और एक्वेटिक एक्सरसाइज करने वालों की तुलना में जिस समूह ने व्यायाम नहीं किया, उनमें हल्का से लेकर गहरा अवसाद होने की आशंका 35 गुना अधिक थी। यह अध्ययन ईरान के कर्मनशाह यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिकल साइंसेज और स्विट्जरलैंड की साइकियाट्रिक यूनिवर्सिटी क्लिनिक एवं बासेल विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने किया है।
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