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Log Call Ya Message Karna Kyon Pasand Karte Hain: आज के दौर में अगर आप किसी को बिना बताए कॉल कर दें, तो उसे 'सरप्राइज' नहीं बल्कि 'हमला' माना जाता है। फोन की घंटी बजते ही हम पहले उसे घूरते हैं और फिर मन ही मन सोचते हैं, ‘इतनी जरूरी क्या बात है जो मैसेज नहीं हो सकता था?’ वहीं हाल ही में जान्हवी कपूर ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि वह टेक्स्टिंग से ज्यादा कॉल करना पसंद करती हैं, क्योंकि कॉल पर बात करना ज्यादा आसान और सीधा लगता है।
लेकिन उनके जैसे गिने-चुने लोगों को छोड़ दें, तो आज की पूरी जनरेशन 'टाइपिंग' की दीवानी है। यहां तक कि लोग आती हुई कॉल को मिस कर देते हैं और फिर तुरंत ही मैसेज करके पूछते हैं कि ‘एनीथिंग अर्जेंट?’ ऐसी स्थिति में साइकोलॉजिस्ट और महिला एवं मानवाधिकारों की समर्थक डॉक्टर मालिनी सबा का मानना है कि हमारे रोजमर्रा के अनुभवों से देखें, तो इस 'कॉल फोबिया' के पीछे कई वजह हैं। आइए हम इनके बारे में थोड़ा विस्तार से जानते हैं।
कॉल पर 'डिलीट' या 'बैकस्पेस' का बटन नहीं होता। जो मुंह से निकल गया, वो निकल गया। टेक्स्ट में हमें सोचने का, थोड़ा रुकने का और अपनी बात को सही ढंग से पेश करने का वक्त मिलता है। कॉल पर अक्सर हम हड़बड़ी में कुछ ऐसा कह जाते हैं जिसका बाद में अफसोस होता है।
कॉल एक तानाशाही की तरह है। यह डिमांड करता है कि आप अपना सारा काम छोड़ें और अभी के अभी बात करें। पुराने समय में फोन घर के एक कोने में होता था, आज फोन हमारी जेब में है। कॉल करने का मतलब है किसी के पर्सनल स्पेस में बिना अनुमति घुस जाना। जबकि टेक्स्ट एक लोकतंत्र है, इसमें तब जवाब दिया जाता है जब व्यक्ति का मन हो। हम अपनी लाइफ का कंट्रोल अपने हाथ में रखना चाहते हैं, और टेक्स्टिंग हमें वो पावर देती है।
कॉल पर जब बात खत्म होने वाली होती है, तो वो जो 5-10 सेकंड का सन्नाटा छा जाता है, वो बहुत भारी लगता है। ‘और बताओ?’ ‘बस और सब बढ़िया, तुम सुनाओ?’ इस खिंची हुई बातचीत से बचने के लिए लोग मैसेज पर एक 'इमोजी' भेज कर बात खत्म करना ज्यादा पसंद करते हैं।
चेहरा नहीं दिखता पर आवाज तो है अजीब बात है कि हम सोशल मीडिया पर हजारों लोगों को अपनी फोटो दिखाते हैं, पर एक इंसान से फोन पर बात करने में घबराहट होती है। इसकी वजह ये है कि कॉल पर हम सामने वाले के हाव-भाव नहीं देख पाते, सिर्फ आवाज सुनते हैं। इससे दिमाग में एक अनजाना डर रहता है कि कहीं सामने वाला बोर तो नहीं हो रहा? या कहीं वो नाराज तो नहीं है?
आज की लाइफ इतनी भागदौड़ वाली है कि हमें लगता है कि कॉल पर 15 मिनट देना समय की बर्बादी है। मैसेज करते हुए हम खाना भी खा सकते हैं, लैपटॉप पर काम भी कर सकते हैं और जिम भी कर सकते हैं। कॉल हमें एक जगह बांध देती है, जो आज की पीढ़ी को पसंद नहीं।
माना कि टेक्स्टिंग आसान है, पर सच तो ये है कि मैसेज पर कभी वो हंसी महसूस नहीं होती जो कॉल पर आती है। हम सुविधा के चक्कर में अपनों की आवाज सुनने की आदत खो रहे हैं। तो कभी-कभी, बिना किसी खास वजह के, उस एक दोस्त को कॉल कर लीजिए जो हमेशा कहता है- ‘मैसेज कर दे भाई!’ यकीन मानिए, बात शुरू होने के 2 मिनट बाद वो खुद ही टेक्स्टिंग भूल जाएगा।
Disclaimer: प्रिय पाठकों यह आर्टिकल केवल सामान्य जानकारी और सलाह देता है। यह किसी भी तरह से चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। इसलिए अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।