
विद्या शर्मा
विद्या शर्मा को डिजिटल मीडिया में लगभग 3 साल का अनुभव है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता ... Read More
Written By: Vidya Sharma | Published : January 20, 2026 10:33 AM IST
Medically Verified By: Dr. Arvind Kumar
Dimag Mai Galat Thoughts Kyu Aate Hain: अक्सर यह देखा गया है कि इंसान अच्छी खबरों की तुलना में बुरी बातों को जल्दी याद कर लेता है। इसे नेगेटिविटी बायस कहा जाता है। माना गया है कि मानव मस्तिष्क का यह स्वभाव विकास की प्रक्रिया से जुड़ा रहा है। हम अगर अपने जीवन का ही उदाहरण लेकर देखें तो पाएंगे कि हम भी उन्हीं चीजों पर अधिक ध्यान देतें हैं जो नकारात्मकता लाती हैं। जैसे हम जो है उसपर ध्यान नहीं देते हैं, बल्कि उन चीजों पर ध्यान देतें हैं जो नहीं हैं। इससे उदासी और डिप्रेशन भी पैदा हो सकते हैं।
ब्रेन नेगेटिव थॉट्स अट्रैक्ट क्यों करता है, यह जानने के लिए हमने नारायणा हॉस्पिटल, जयपुर के न्यूरोलॉजिस्ट डॉक्टर अरविंद कुमार से बात की। हमने उनसे जाना कि ऐसा क्यों होता है तो उन्होंने बताया कि ‘ब्रेन का एक हिस्सा ऐसा पाया गया है जो खतरे और डर से जुड़ी सूचनाओं को तेजी से प्रोसेस करता है। जब कोई नकारात्मक विचार आता है, तो ब्रेन उसे संभावित खतरे के रूप में देखता है। इस स्थिति में शरीर अलर्ट मोड में चला जाता है। दिल की धड़कन तेज होने लगती है और दिमाग बार बार उसी सोच में उलझा रहता है। इस प्रक्रिया का मकसद खुद को सुरक्षित रखना माना गया है, लेकिन आधुनिक जीवन में यही प्रक्रिया मानसिक बोझ बढ़ाने लगती है।’ आइए हम थोड़ा विस्तार से जानते हैं।
आज के समय में नेगेटिव थॉट्स का एक बड़ा स्रोत डिजिटल दुनिया मानी गई है। सोशल मीडिया, ब्रेकिंग न्यूज और लगातार मिलती सूचनाएं ब्रेन को हर समय सतर्क रखती हैं। जब बार बार डर, बीमारी, नुकसान या असफलता से जुड़ी बातें देखी जाती हैं, तो दिमाग उन्हें ज्यादा महत्वपूर्ण मानने लगता है। धीरे धीरे यह पैटर्न बन जाता है कि ब्रेन खुद ही नेगेटिव कंटेंट की ओर आकर्षित होने लगता है, भले ही वह वास्तविक जीवन से सीधे जुड़ा न हो।
यह माना गया है कि लगातार नकारात्मक सोच से ब्रेन में न्यूरल पाथवे मजबूत हो जाते हैं। यानी जैसे जैसे कोई सोच दोहराई जाती है, वैसे वैसे वह दिमाग के लिए आसान रास्ता बन जाती है। इसी वजह से एक नकारात्मक विचार दूसरे नकारात्मक विचार को जन्म देता हुआ महसूस किया जाता है। यह आदत धीरे धीरे चिंता, तनाव और नींद से जुड़ी समस्याओं में बदल सकती है।दूसरे नकारात्मक विचार को जन्म देता हुआ महसूस किया जाता है। यह आदत धीरे धीरे चिंता, तनाव और नींद से जुड़ी समस्याओं में बदल सकती है।
नेगेटिव थॉट्स के दौरान शरीर में स्ट्रेस हार्मोन का स्तर बढ़ा हुआ पाया गया है। यह हार्मोन दिमाग को बार बार उसी सोच पर लौटने के लिए प्रेरित करता है। लंबे समय तक ऐसा रहने पर दिमाग को पॉजिटिव संकेतों पर ध्यान देना मुश्किल लगने लगता है। यही कारण है कि कई लोग अच्छी चीजों के बीच भी खालीपन या बेचैनी महसूस करते हुए पाए जाते हैं।
न्यूरोलॉजिकल रिसर्च में यह बात सामने आई है कि ब्रेन में लचीलापन होता है। इसे न्यूरोप्लास्टिसिटी कहा जाता है। इसका मतलब यह है कि सोचने का तरीका बदला जा सकता है। जब व्यक्ति जानबूझकर पॉजिटिव अनुभवों पर ध्यान देता है, कृतज्ञता की आदत डालता है या माइंडफुलनेस जैसी तकनीकों को अपनाता है, तो ब्रेन नए रास्ते बनाना शुरू कर देता है। धीरे धीरे नेगेटिव थॉट्स का प्रभाव कम होने लगता है।
सबसे पहला कदम यह माना गया है कि नकारात्मक विचारों को पहचाना जाए, न कि उनसे लड़ने की कोशिश की जाए। जब यह समझ में आने लगता है कि हर नकारात्मक विचार सच नहीं होता, तो ब्रेन को नई दिशा मिलती है। इससे मानसिक संतुलन बेहतर होने लगता है और जीवन की चुनौतियों को देखने का नजरिया भी बदलता हुआ महसूस किया जाता है।
कुल मिलाकर यह समझा गया है कि ब्रेन का नेगेटिव थॉट्स की ओर आकर्षित होना कोई कमजोरी नहीं, बल्कि एक जैविक प्रक्रिया का हिस्सा रहा है। फर्क बस इतना है कि आज के समय में इस प्रक्रिया को समझकर संभालना जरूरी हो गया है, ताकि दिमाग खतरे का नहीं बल्कि समाधान का साथी बन सके।
Disclaimer: प्रिय पाठकों यह आर्टिकल केवल सामान्य जानकारी और सलाह देता है। यह किसी भी तरह से चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। इसलिए अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।