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3-5 साल की उम्र के बच्चों के बिहेवियर में कौन से बदलाव आते हैं, जिन्हें संभालना जरूरी होता है?

क्या आपके बच्चे की उम्र भी 3-5 साल है और वह चिड़चिड़ा रहता है? अगर हां तो इसका मतलब यह है कि वह अपनी भावनाओं को आपको व्यक्त नहीं कर पा रहा है। आइए साइकोलॉजिस्ट से जानते हैं ऐसा क्यों हो रहा है।

3-5 साल की उम्र के बच्चों के बिहेवियर में कौन से बदलाव आते हैं, जिन्हें संभालना जरूरी होता है?
VerifiedVERIFIED By: Dr. Malini Saba

Written by Vidya Sharma |Published : February 14, 2026 10:49 AM IST

Bacho Mai Age Ke Sath Aane Wale Badlav: बच्चों की 3 से 5 साल की उम्र को बचपन का सबसे सक्रिय और संवेदनशील दौर माना जाता है। इस उम्र में बच्चे तेजी से सीखते हैं, नई चीजें समझते हैं और अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश करते हैं। लेकिन यही वह समय भी है जब माता-पिता को सबसे ज्यादा धैर्य और समझदारी की जरूरत होती है। महिला एवं मानवाधिकारों की समर्थक और साइकोलॉजिस्ट डॉक्टर मालिनी सबा कहती हैं कि 

‘3-5 साल की उम्र में बच्चे ‘स्वतंत्रता की भावना’ विकसित करना शुरू कर देते हैं। वे अपनी पसंद-नापसंद खुलकर दिखाते हैं और हर चीज को खुद अनुभव करना चाहते हैं। यही कारण है कि इस उम्र में जिद, गुस्सा और अचानक मूड बदलना आम बात है।’

लेकिन इस दौरान अगर माता-पिता बच्चे की जरूरतों पर ध्यान न दें या फिर उन्हें गलत करने दें तो यह लंबे समय के लिए बच्चे के बिहेवियर में बैठ सकता है। इसलिए माता-पिता के लिए यह जानना बहुत जरूरी होता है कि मानसिक रूप से उनका बच्चा कैसे फील कर रहा है या वह क्या चाहता है। आइए आपको बताते हैं कि डॉक्टर मालिनी ने इस विषय पर क्या जानकारी दी।

स्वतंत्र पहचान की शुरुआत

इस उम्र में बच्चा खुद को एक अलग व्यक्ति के रूप में पहचानना शुरू करता है। वह चाहता है कि उसकी बात सुनी जाए, चाहे वह कपड़े चुनने की बात हो या खिलौना लेने की। जब उसकी इच्छा पूरी नहीं होती, तो वह रोकर या गुस्सा करके प्रतिक्रिया देता है। डॉ. मालिनी सबा कहती हैं कि यह व्यवहार असामान्य नहीं, बल्कि विकास की स्वाभाविक प्रक्रिया है।

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भावनाओं को व्यक्त करने में कठिनाई

डॉक्टर सबा बताती हैं कि ‘3-5 साल के बच्चों में भावनाएं बहुत तेज होती हैं, लेकिन उन्हें व्यक्त करने के लिए शब्द सीमित होते हैं। अगर बच्चा थका हुआ, भूखा या परेशान है, तो वह सीधे यह नहीं बता पाता। उसकी बेचैनी रोने या चिल्लाने के रूप में सामने आती है। ऐसे में माता-पिता का शांत रहना बेहद जरूरी है।’ इसलिए ऐसे में आप अपने दिमाग को शांत रखें और बच्चे की भावनाओं को समझने की कोशिश करें।

अत्यधिक ऊर्जा और जिज्ञासा

इस उम्र में बच्चों की ऊर्जा बहुत ज्यादा होती है। वे लगातार दौड़ना, खेलना और नई चीजें आजमाना चाहते हैं। लंबे समय तक एक जगह बैठना उनके लिए कठिन होता है। डॉक्टर मालिनी सबा के अनुसार, बच्चों की इस ऊर्जा को दबाने के बजाय सही दिशा देना अधिक उपयोगी होता है।

सीमाओं को परखना

बच्चे इस उम्र में नियमों को समझने और परखने की कोशिश करते हैं। वे देखते हैं कि अगर वे कोई नियम तोड़ते हैं तो माता-पिता की क्या प्रतिक्रिया होगी। डॉ. मालिनी सबा कहती हैं कि यहां सख्ती से ज्यादा निरंतरता जरूरी है। अगर नियम बार-बार बदलेंगे, तो बच्चा भ्रमित हो सकता है।

सामाजिक कौशल का विकास

यह उम्र सामाजिक व्यवहार सीखने की भी होती है। खिलौने साझा करना, बारी का इंतजार करना और दूसरों की भावनाएं समझना, ये सब धीरे-धीरे विकसित होता है। इस प्रक्रिया में झगड़े और शिकायतें होना सामान्य है।

माता-पिता क्या करें?

  • धैर्य रखें और प्रतिक्रिया देने से पहले सोचें।
  • बच्चे की भावनाओं को समझें और शब्दों में व्यक्त करने में मदद करें।
  • स्पष्ट और सरल नियम तय करें।
  • अच्छे व्यवहार की सराहना करें।
  • रोज कुछ समय केवल बच्चे के साथ बिताएं।

3-5 साल की उम्र चुनौतीपूर्ण जरूर होती है, लेकिन यही वह समय है जब बच्चे का व्यक्तित्व आकार ले रहा होता है। जिद, गुस्सा और जिज्ञासा - ये सब उसके विकास का हिस्सा हैं।

डॉक्टर मालिनी सबा मानती हैं कि अगर माता-पिता प्यार, धैर्य और संतुलन के साथ इस दौर को संभालें, तो यह समय भविष्य के मजबूत और आत्मविश्वासी व्यक्तित्व की नींव बन सकता है।

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Disclaimer: प्रिय पाठकों यह आर्टिकल केवल सामान्य जानकारी और सलाह देता है। यह किसी भी तरह से चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। इसलिए अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।